Friday, September 17, 2010

मुझे घूंट देदो बस विष का ......



क्यों करते हो आस निकालेगा कोई आकर के तुमको,
उलझ गये हो जब अपने ही बुने हुए ताने बाने में.

नहीं कोई भी कन्धा जिस पर
सिर रख कर के तुम रो लेते.
नहीं कोई भी बांह पकड़ कर
जिसको यहाँ संभल तो लेते.

चलो ठीक था अगर डुबाई होती नौका तूफानों ने,
लेकिन धोखा दिया किनारे ने ही हम को अनजाने में.

जितना धूमिल करना चाहा
चित्र तुम्हारा उतना निखरा.
जितना दर्द समेटा उर में
उतना ही नयनों से बिखरा.

जाना ही था अगर तुम्हें तो ले जाती यादें भी अपनी,
नहीं घुमड़ती रहतीं जिससे यह मेरे इस वीराने में.

क्या अब कुछ जीवन से मांगे,
इतना ही है बोझ बन गया.
क्या होगा फिर प्यार ढूंढ़ कर,
यही स्वयं जब रोग बन गया.

ले जाओ अमृत अपना यह, मुझे घूंट देदो बस विष का,
इतना मोह म्रत्यु से अब तो सफल न होगी बहकाने में.

16 comments:

  1. जितना धूमिल करना चाहा
    चित्र तुम्हारा उतना निखरा.
    जितना दर्द समेटा उर में
    उतना ही नयनों से बिखरा.

    जाना ही था अगर तुम्हें तो ले जाती यादें भी अपनी,
    नहीं घुमड़ती रहतीं जिससे यह मेरे इस वीराने में.

    बहुत बढ़िया...बहुत अच्छी

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  2. Sharma Ji saarthak aur bhaawpurn rachanaa hai.

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  3. वीना जी और माणिक जी प्रोत्साहन और ब्लॉग से जुड़ने के लिए धन्यवाद..

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  4. bahut sundar kavitaa...
    चलो ठीक था अगर डुबाई होती नौका तूफानों ने,
    लेकिन धोखा दिया किनारे ने ही हम को अनजाने में.
    ..bahut sundar panktiyaa....

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  5. धन्यवाद डॉ.गैरोला जी .....

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  6. बहुत सुन्दर भाव लिए सुन्दर रचना...
    यहाँ भी पधारें ...
    विरक्ति पथ
    अनुष्का

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  7. जितना धूमिल करना चाहा
    चित्र तुम्हारा उतना निखरा.
    जितना दर्द समेटा उर में
    उतना ही नयनों से बिखरा.

    सुन्दर पंक्तियाँ।
    .

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  8. जितना दर्द समेटा उर में
    उतना ही नयनों से बिखरा.

    bahut khoob .... kailash ji...

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  9. धन्यवाद डॉ. दिव्या जी और क्षितिजा जी.....

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  10. क्यों करते हो आस निकालेगा कोई आकर के तुमको,
    उलझ गये हो जब अपने ही बुने हुए ताने बाने में.

    ले जाओ अमृत अपना यह, मुझे घूंट देदो बस विष का,

    बढ़िया...

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  11. @--क्या अब कुछ जीवन से मांगे,
    इतना ही है बोझ बन गया.
    क्या होगा फिर प्यार ढूंढ़ कर,
    यही स्वयं जब रोग बन गया....

    लेकिन कैलाश जी, ये निराशा क्यूँ ?

    .

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  12. जितना धूमिल करना चाहा
    चित्र तुम्हारा उतना निखरा
    बेहतरीन भाव की कविता ... बहुत सुन्दर

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  13. @मिश्रा जी और वर्मा जी
    आपके प्रोत्साहन के लिए धन्यवाद.....

    @डॉ.दिव्या जी
    आपके प्रश्न का उत्तर देना बहुत कठिन है....सब कुछ उपलब्ध होने के वाबजूद जीवन के कुछ ऐसे कौने होते हैं जो रिक्त रह जाते हैं और मन में अवसाद भर देते हैं ...... वे क्षण विवश कर देते हैं भावनाओं को कविता में उड़ेल देने के लिए...

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  14. बेहतरीन भाव ... बहुत सुन्दर

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  15. बेहतरीन भाव ... बहुत सुन्दर

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