Wednesday, February 01, 2012

रोटी या किताब ?

चमचमाती स्कूल ड्रैस
पीठ पर लटकता बस्ता
हसरत जगा देता है 
स्कूल जाने की.

लेकिन नज़र आता है
खांसते हुए रिक्शा चलाता बापू
घरों में झाडू पोंछा करती माँ
और फिर भी नहीं मिल पाती
भरपेट रोटी भाई बहनों को.

सबको मुफ्त शिक्षा 
किताबें और ड्रैस 
नहीं काफी जीने को,
भर नहीं सकता पेट 
केवल किताबों से.
क्या फायदा उस शिक्षा का
जो कर दे खड़ी
बेरोजगारों की एक लम्बी क़तार.

वातानुकूलित हॉल में 
बाल मज़दूरी पर बहस करना
और कानून बनाना 
बहुत आसान है,
लेकिन जाकर देखें
किसी गरीब का घर
और उनकी मज़बूरी.

सड़क पर आवारागर्दी करने
चोरी या भीख माँगने से बेहतर
गाड़ी के नीचे लेटकर 
नट बोल्ट खोलना,
ग्रीस और धूल से 
काले हुए कपड़ों को भूल,
सपने देखना
कि बन जाऊँगा 
मैं भी उस्ताद 
कुछ सालों बाद.

केवल आश्वासन देने
या क़ानून बनाने से
पेट नहीं भरता,
मुझे इस पेचकस और पाने में
दिखती है शाम की रोटी
और अपना भविष्य.

कैलाश शर्मा 

66 comments:

  1. आज की सच्चाई दर्शाती सुंदर रचना, प्रस्तुति बहुत अच्छी लगी.

    welcome to new post --काव्यान्जलि--हमको भी तडपाओगे....

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  2. विरोधाभास का मार्मिक चित्रण

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  3. बहुत सही.....यथार्थ का आईना दिखती पोस्ट...काश सभी लोग समझ पाते और देख पाते उस पेंचकस और पाने मे छुपी शाम की रोटी की जरूरत को तो शायद आज कहीं और ही होते हम ...बहुत बढ़िया सर

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  4. reality unleashed..
    true its easy to make laws but when it comes to implementation.. everything looks just mockery

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    1. sach baat kahti hai aapki likhi yah rachna ,,bahut sundar abhiwykti ...

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  5. क्या फायदा उस शिक्षा का
    जो कर दे खड़ी
    बेरोजगारों की एक लम्बी क़तार.

    बहुत सुन्दर और सत्य को उजागर करती ये पोस्ट लाजवाब है......हैट्स ऑफ इसके लिए|

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  6. केवल आश्वासन देने
    या क़ानून बनाने से
    पेट नहीं भरता,
    मुझे इस पेचकस और पाने में
    दिखती है शाम की रोटी
    और अपना भविष्य.....बिल्कुल सही कहा कैलाश जी आप ने..आज अधिकतर लोगो को ऐसी ही स्थिति का सामना करना पड़ रहा है..मार्मिक चित्रण किया है..

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  7. आपके उत्‍कृष्‍ठ लेखन का आभार ।

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  8. केवल आश्वासन देने
    या क़ानून बनाने से
    पेट नहीं भरता,
    मुझे इस पेचकस और पाने में
    दिखती है शाम की रोटी
    और अपना भविष्य.
    उत्तम सोच !शायद , क़ानून बनाने वालों की नींद खुल जाए.....

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  9. बहु‍त ही बढि़या।

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  10. कटु सत्य है जीवन का,हमारे समाज का....
    बेहद सार्थक रचना..
    सादर.

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  11. बहुत बढ़िया, यही सब बातें तो इन करप्ट हुकुमरानो के कचरे दिमाग में नहीं घुसती कि सिर्फ वोट के लिए लैपटॉप का झुनझुना गरीब का पेट नहीं भर सकता !

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  12. वातानुकूलित हॉल में
    बाल मज़दूरी पर बहस करना
    और कानून बनाना
    बहुत आसान है,
    लेकिन जाकर देखें
    किसी गरीब का घर
    और उनकी मज़बूरी.
    ...भाषण में मेहनत नहीं , आदर्श ही आदर्श है . आँखों की चाह दहकती जा रही है

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    1. केवल आश्वासन देने
      या क़ानून बनाने से
      पेट नहीं भरता,
      Yahee sach hai!

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  13. saarthak desh ki gambheer samsya ki taraf ishara karti behtreen prastuti.

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  14. सार्थक चिंतन सर... कटु सत्य को चित्रित करती खूबसूरत रचना...
    सादर बधाई..

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  15. ekdam jhakkas baat keh di :)
    ye sab hmari sarkaar ko smjh aana chahiye...

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  16. मुझे इस पेचकस और पाने में
    दिखती है शाम की रोटी
    और अपना भविष्य....

    nice one sir...

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  17. कटु सच को बहुत ही सहजता और सार्थकता से प्रस्तुत किया है आपने......

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  18. केवल आश्वासन देने
    या क़ानून बनाने से
    पेट नहीं भरता...

    सटीक कथन... असली जीवन कुछ और है...सच्चाई यही है... आभार

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  19. वाह ...जीवन की सचाई को दिखाती और सुनाती हुई रचना ...सार्थक लेखनी

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  20. SACCHHAYI KA EK CHEHRA YE BHI.....SOCHNE PAR MAZBOOR KARTI RACHNA.

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  21. सवालों से मुठभेड़ करती कविता अच्छी लगी।

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  22. एक कटु सत्य ...सार्थक रचना

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  23. बहुत ही अंदर तक घुस जाने वाली रचना

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  24. सटीक चित्रण ...आज के हालातों और मानसिकता का

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  25. मौजूदा अव्‍यवस्‍थाओं को प्रदर्शित करती पोस्‍ट।

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  26. बेहतरीन सार्थक रचना,लाजबाब आज के हालातों का प्रस्तुतीकरण..

    NEW POST...40,वीं वैवाहिक वर्षगाँठ-पर...

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  27. सच्चाई को आपने बहुत खूबसूरती से शब्दों में पिरोया है! आज हमारे देश में यही हालत है और पढ़ाई या नौकरी इन दोनों में किसी एक को चुनना पड़ता है तो बहुत मुश्किल हो जाता है! दिल को छू गई हर एक शब्द !

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  28. उस्ताद बनने का सपना लिए रोटी की जुगत .. मर्म पर आघातिक रचना और अपनी विवशता कि केवल आह ही कर रह जाते हैं..

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  29. मार्मिक सत्य,उत्‍कृष्‍ठ लेखन |

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  30. कल 03/02/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  31. सच को परिभाषित करती कविता...

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  32. आपकी पोस्ट आज के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
    कृपया पधारें
    http://charchamanch.blogspot.in/2012/02/777.html
    चर्चा मंच-777-:चर्चाकार-दिलबाग विर्क

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  33. हर बच्चे को शिक्षा ही नहीं वरन स्तरीय और समान शिक्षा मिले...

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  34. क्या कहे जिन बच्चो के मां बाप पढ़े लिखे नही है वे कैसे हमारे बच्चो से मुकाबला कर पायेंगे यह् समस्या कैसी है सदियो की खता हमारी अगली पीढ़ी चुकायेगी

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  35. सच को उसी सरलता से मगर बेहद प्रभावी तरीके से प्रस्तुत करने की बधाई

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  36. वातानुकूलित हॉल में बाल मज़दूरी पर बहस करना
    और कानून बनाना बहुत आसान है!
    बहुत ही सार्थक और सुन्दर रचना!

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  37. ऐसी ही होती है सच्ची कविता, जो दूसरे के दर्द का अहसास कराये।
    बधाई के साथ साथ आभार भी.....
    कृपया इसे भी पढ़े
    नेता,कुत्ता और वेश्या

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  38. kamaal ki rachna hai sir..
    bahut sahi kaha apne.. AC hall mein baith kar kanoon bana dena aur ye soch lena ki sab sudhar gaya.. bahut aasaan hai..
    par asli zameen ki haalat kya hai wo to zameen par rehne wala hi jaanta hai ..

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  39. केवल आश्वासन देने
    या क़ानून बनाने से
    पेट नहीं भरता,
    मुझे इस पेचकस और पाने में
    दिखती है शाम की रोटी
    और अपना भविष्य.

    एक दम सही कहा है .. यथार्थवादी रचना ..

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  40. सत्य को उजागर करती यथार्थवादी रचना लाजवाब है...

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  41. सर बहुत ही अच्छी कविता |

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  42. केवल आश्वासन देने
    या क़ानून बनाने से
    पेट नहीं भरता,
    मुझे इस पेचकस और पाने में
    दिखती है शाम की रोटी
    और अपना भविष्य.

    आपकी कविता तो कैलाश जी हकीकत को आइना दिखा रही है. बहुत सुंदर बधाई.

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  43. मार्मिक किन्तु हकीकत के बहुत करीब ...
    बहुत ही लाजवाब .. सोचने को मजबूर करती की हमारा जनतंत्र कितना जन लिए हुवे है ...

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  44. केवल आश्वासन देने
    या कानून बनाने से
    पेट नहीं भरता,
    मुझे इस पेचकस और पाने में
    दिखती है शाम की रोटी

    मूक असहायों की वेदना को अभिव्यक्त करती अच्छी रचना।

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  45. बिलकुल सही कहा आपने.

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  46. सार्थक सृजन, बधाई.

    कृपया मेरे ब्लॉग"meri kavitayen" पर भी पधारकर अपना स्नेहाशीष प्रदान करें, आभारी होऊंगा.

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  47. वाह!!!!!बहुत सुंदर प्रस्तुति ,अच्छी रचना
    नई रचना ...काव्यान्जलि ...: बोतल का दूध...

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  48. वाह!!!!!बहुत सुंदर प्रस्तुति ,अच्छी रचना
    नई रचना ...काव्यान्जलि ...: बोतल का दूध...

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  49. जब तक गरीबी का अभिशाप नहीं मिटता तब तक शिक्षा का स्वप्न भी अधूरा ही रहेगा..

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  50. विकास की आंकड़ेबाज़ी के बीच की हकीक़त यही है।

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  51. बहुत ही लाजवाब .. सोचने को मजबूर करती अच्छी रचना
    लम्बे अन्तराल के बाद नई पोस्ट पर आपका स्वागत है
    ......अनाम रिश्ते

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  52. सुन्दर अभिव्यक्ति!

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  53. मुझे इस पेचकस और पाने में
    दिखती है शाम की रोटी
    और अपना भविष्य.bilkul shi bat.

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  54. अत्यंत संवेदनशील रचना...
    सादर.

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  55. hmmmmmmmmmmm...............ab chain mila hain sari posts padh li..........
    bs itna hi wah....amazing thi sari posts

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