Thursday, April 26, 2012

श्रीमद्भगवद्गीता-भाव पद्यानुवाद (दूसरी कड़ी)



  प्रथम अध्याय

(अर्जुन विषाद योग - १.३३-४७)

जिनके राज्य सुखों की खातिर
हम लड़ने को अड़े हुए हैं.
वे सब प्राण और संपत्ति तज,
युद्धस्थल में खड़े हुए हैं.  (१.३३)

पिता, पुत्र, आचार्य, पितामह,
श्वसुर, पुत्र, सम्बन्धी, भ्राता.
तीनों लोक राज्य यदि पाऊँ,
फ़िर भी मैं न वध कर पाता.  (१.३४-३५)

कैसे मुझको खुशी मिलेगी,
धृतराष्ट्र पुत्रों के वध से.
पाप लगेगा मुझे स्वयं ही,
अताताइयों के इस वध से.  (१.३६)

हनन कौरवों का मधुसूदन.
मुझको उचित नहीं लगता है.
इष्ट बंधुओं का वध करके,
कोई सुखी क्या रह सकता है?  (१.३७)

दुर्योधन कुल नाश को तत्पर,
राज्य लोभ से अंधे हो कर.
उसको पाप नजर न आता,
बुद्धि, विवेक से वंचित हो कर.  (१.३८)

देख रहे हैं हम प्रत्यक्ष में
इसका दोष जो होगा हम पर.
कैसे हों निवृत्त पाप से
क्यों विचार करें न मिलकर.  (१.३९)

कुल का क्षय जब हो जाता,
कुल धर्म परम्परायें भी मिट जातीं.
हो जाता जब नाश धर्म का,
शेष वंश में अधर्म की छाया आती.  (१.४०)
                                   
जब अधर्म छा जाता जग में,
कुल स्त्री दूषित हो जातीं.
कुल स्त्री के दूषित होने पर,
जन्म वर्णसंकर संतानें पातीं.  (१.४१)

कुलघातियों व उनके कुल को
ये संतान नरक का कारण होतीं.
पिंड और जलदान क्रिया बिन,
पितर पतन का कारण होतीं.  (१.४२)

हे माधव इन दोषों के कारण,
कुल, जाति धर्म नष्ट हो जाते.
जिनके कुलधर्म नष्ट हो गये,
उनके पितर नरक में जाते.  (१.४३-४४)

केवल राज्यसुखों के कारण
इतना पाप जा रहे करने.
बंधुजनों का वध करने का
कैसे सोच लिया था हमने.  (१.४५)

न प्रतिकार करूँगा कोई
यदि सशस्त्र दुर्योधन आये.
मेरे लिये ये होगा हितकर
वह मेरा यदि वध कर जाये.  (१.४६)


संजय
शोक व्यथित होकर के अर्जुन
धनुष बाण सब अपने तज कर.
व्याकुल चित से युद्ध भूमि में
बैठ गया आ कर के रथ पर.  (१.४७)

**पहला अध्याय समाप्त**




                        .....क्रमशः

 कैलाश शर्मा

19 comments:

  1. अर्जुन की व्यथा यात्रा का सजीव भाव तर्जुमा .क्या कहने हैं भाई साहब .सुन्दरम मनोहरं .

    बहुर सुन्दर रचना है भाई जान .बधाई .

    कृपया यहाँ भी पधारें -

    http://kabirakhadabazarmein.blogspot.in/
    टी वी विज्ञापनों का माया जाल और पीने की ललक

    ReplyDelete
  2. केवल राज्य सुखों के कारण
    इतना पाप जा रहे करने.
    बंधुजनों का वध करने का
    कैसे सोच लिया था हमने.... is yatra kee punravriti achhi hai

    ReplyDelete
  3. न प्रतिकार करूँगा कोई
    यदि सशस्त्र दुर्योधन आये.
    मेरे लिये ये होगा हितकर
    वह मेरा यदि वध कर जाये.

    बहुत सुन्दर भावानुवाद!!

    ReplyDelete
  4. शोक व्यथित होकर के अर्जुन
    धनुष बाण सब अपने तज कर.
    व्याकुल चित से युद्ध भूमि में
    बैठ गया आ कर के रथ पर.

    वाह!!!!सुंदर प्रस्तुति,..बहुत प्रभावी रचना,..

    MY RECENT POST...काव्यान्जलि ...: गजल.....

    ReplyDelete
  5. उम्दा प्रयास... शुभकामनाएं कि पूरी गीता का पद्यानुवाद शीघ्र हो... बहुत बढ़िया...

    ReplyDelete
  6. गीता को जन-जन तक पहुंचाने का बीड़ा उठाया है आपने,इसके लिए साधुवाद !

    ReplyDelete
  7. बड़ी ही सरल और प्रवाहमयी भाषा में गीता का ज्ञान..

    ReplyDelete
  8. बहुत ही सुन्दरता से शब्दों में ढाल रहें हैं आप।

    ReplyDelete
  9. बहुत सुंदर अनुवाद..कृष्ण की कृपा से ही यह संभव है !

    ReplyDelete
  10. bahut sunder aur saral bhaasha me geeta ka gyan de kar sunder shuruaat ki hai. ham angraheet ho rahe hain.

    ReplyDelete
  11. आप पुण्य कमा रहै हैं ।इस पोस्ट पर नियमित रहूंगा । धन्यवाद ।

    ReplyDelete
  12. wah chalo isi bahane geeta padhne ka sobhagya mil jayega..bahut sundar chitran....agle ank ka intzar....

    मत भेद न बने मन भेद- A post for all bloggers

    ReplyDelete
  13. बहुत सुंदर अनुवाद।
    गीतात्मकता ने भाव संप्रेषण में वृद्धि ही की है।

    ReplyDelete
  14. शोक व्यथित होकर के अर्जुन
    धनुष बाण सब अपने तज कर.
    व्याकुल चित से युद्ध भूमि में
    बैठ गया आ कर के रथ पर.

    आपकी यह शृंखला बहुत सुंदर है एक दम सीधी सरल बात.

    ReplyDelete
  15. आपकी सरल भाषा दिल को छूती है.
    सुन्दर प्रस्तुति के लिए आभार.

    ReplyDelete