Sunday, June 24, 2012

श्रीमद्भगवद्गीता-भाव पद्यानुवाद (१७वीं-कड़ी)


तृतीय अध्याय
(कर्म-योग - ३.३६-४३)


अर्जुन 


हे वार्ष्णेय बताओ मुझको
ऐसा क्या कारण है होता.
नहीं चाहते हुए भी मानव 
पाप कर्म अग्रसर होता.


श्री भगवान 


काम क्रोध इसका कारण है,
जो रज गुण से पैदा होता.
इसे ही अपना वैरी समझो,
पापी महा, सर्वभोक्ता होता.


धूम्र ढके है जैसे अग्नि,
धूल है दर्पण को ढक लेता.
यथा गर्भ चर्म आच्छादित,
रजगुण तथा ज्ञान ढक देता.


काम ज्ञान आच्छादित करता,
ज्ञानी जन का चिर शत्रु है.
जितना भोगो उतना भडके,
विषय भोग अग्नि सदृश है.


इन्द्रिय, मन, बुद्धि में स्थित
होकर ज्ञान करे आच्छादित.
अर्जुन काम इस तरह करता
सब प्राणी जन को है मोहित.


तुम अपनी इन्द्रिय पर अर्जुन,
सबसे पहले करो नियंत्रण.
पाप रूप काम को तज दो,
ज्ञान विज्ञान नाश का कारण. 


तन से श्रेष्ठ इन्द्रियां होतीं,
श्रेष्ठ इन्द्रियों से मन होता.
मन से निश्चय बुद्धि श्रेष्ठ है,
बुद्धि परे अंतर्यामी आत्मा.


जान बुद्धि से श्रेष्ठ आत्मा
कर संयुक्त आत्मा से मन.
बहुत कठिन विजय है जिस पर
करो काम रूप शत्रु का मर्दन.


........तीसरा अध्याय समाप्त 


             .........क्रमशः


कैलाश शर्मा 

17 comments:

  1. तन से श्रेष्ठ इन्द्रियां होतीं,
    श्रेष्ठ इन्द्रियों से मन होता.
    मन से निश्चय बुद्धि श्रेष्ठ है,
    बुद्धि परे अंतर्यामी आत्मा.
    बहुत सुन्दर विवरण सुन्दर शब्दावली ...बधाई कैलाश जी

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  2. तुम अपनी इन्द्रिय पर अर्जुन,
    सबसे पहले करो नियंत्रण.
    पाप रूप काम को तज दो,
    ज्ञान विज्ञान नाश का कारण.

    भावों का सुंदर सम्प्रेषण,,,,,अच्छी श्रंखला

    RECENT POST,,,,,काव्यान्जलि ...: आश्वासन,,,,,

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  3. बहुत सुंदर और सरल भाषा में सार तत्व कह दिया

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  4. हिंदी अनुवाद देख कर हम जैसे हिंदी प्रेमियों के लिये गर्व का विषय है. आदरणीय कैलाश जी आपको हृदय से नमन.

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  5. आनन्द और ज्ञान दोनों चले आ रहे हैं, सरल साहित्य में सजे..

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  6. सरल भाषा मे बहुत सुन्दर और सारगर्भित प्रसंग चल रहा है …………आभार

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  7. तन से श्रेष्ठ इन्द्रियां होतीं,
    श्रेष्ठ इन्द्रियों से मन होता.
    मन से निश्चय बुद्धि श्रेष्ठ है,
    बुद्धि परे अंतर्यामी आत्मा.

    सरल सहज भाषा...सारगर्भित...आभार !!

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  8. क्या बात है!!
    आपकी यह ख़ूबसूरत प्रविष्टि कल दिनांक 25-06-2012 को सोमवारीय चर्चामंच-921 पर लिंक की जा रही है। सादर सूचनार्थ

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  9. उत्कृष्ट |
    बहुत बहुत बधाई |

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  10. Its interesting to read such great scriptures in this form :)
    a lot to think n learn !!!

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  11. वाह ... बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति।

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  12. अद्भुत सर....
    इस अद्वितीय शृंखला के लिए सादर बधाई स्वीकारें...

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  13. सुन्दर और शानदार प्रस्तुति।

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