Monday, December 10, 2012

माता-पिता (तांका)

    (१)
माँ का जीवन
समर्पित बच्चों को 
पर बुढापा
गुज़रता अकेला 
अनजान कोने में.

    (२)
जीवनदात्री 
गोदी थी सुरक्षित 
आज वही माँ
ढूँढती एक कांधा
पल भर रोने को.

    (३)
जलती सदां 
परिवार चिंता में,
मगर रोटी 
कभी नहीं जलती 
बनी माँ के हाथों की.

    (४)
न शिकायत 
न शिकन माथे पे 
वह माँ ही है 
भगवान का रूप
उत्कृष्ट वरदान.

    (५)
माँ की ममता 
नहीं कोई तुलना,
गर दो रोटी 
कह देती बेटे से 
मैंने खाना खा लिया.

    (६)
धुंधली आँखें
लड़खड़ाते पैर 
कांपते हाथ
थे सहारा सबका 
ढूँढ़ते एक कांधा.

    (७)
कंधे पे बैठे 
झूले झूला बांहों में,
आज वो पिता 
ढूँढता वो उंगली 
छूट गयी हाथ से.

    (८)
पिता का दर्द 
समझा है किसने 
टूटा है दिल
आँखों में नहीं आंसू 
दिल हुआ प्रस्तर. 

© कैलाश शर्मा

40 comments:

  1. Bahut hi hriday sparshi prastuti,pretyk pankti ne jhkjhor diya,nyee post eklvy aur shabdo....aap kipratiksha me hai

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  2. Replies
    1. namaskaar kailash ji , sabhi tanka bahut acche hai , abhivyakti ke sare charan , badhai aapko

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  3. आप की इस सचाई भरी रचना के एहसास महसूस
    करने के लिए हैं ..न कि सिर्फ टिप्पणी ???
    अहसासों का शुक्रिया !

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  4. (५)
    माँ की ममता
    नहीं कोई तुलना,
    गर दो रोटी
    कह देती बेटे से
    मैंने खाना खा लिया.

    माता -पिता (तांका )शब्दों से बहुत ऊपर हैं .

    (५)
    माँ की ममता
    नहीं कोई तुलना,
    गर दो रोटी
    कह देती बेटे से
    मैंने खाना खा लिया.

    स्वार्थ हीन छाता पिता है ,माँ ममता ही ममता ....

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  5. सिर्फ,माँ की ममता में कोई स्वार्थ नही होता ,लाजबाब रचना....बधाई कैलाश जी,,

    recent post: रूप संवारा नहीं,,,

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  6. वृद्ध माता-पिता के एहसासों को तांका में सार्थकता से बांधा है...वाकई लाजवाब !!

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  7. माता पिता का हृदय कौन समझ पाया है

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  8. मार्मिक.....आँखें भिगो गयी ये पंक्तियाँ....

    सादर
    अनु

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  9. माँ की सच्ची कहानी आपकी जबानी बहुत ही सुन्दर .खुली किताब की तरह ..

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  10. माँ ममता की गागर
    पिता संयम का सागर... मार्मिक अभिव्यक्ति

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  11. ek ek rachna sochne par majboor karti hui...sarthak abhivyakti..

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  12. बिलकुल ह्रदय तक छू गयी. बहुत सुन्दर कविता. सच्चे भाव.

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  13. माँ की ममता
    नहीं कोई तुलना,
    गर दो रोटी
    कह देती बेटे से
    मैंने खाना खा लिया.


    सभी तांका रचनाएँ मन को छूती हुई

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  14. जीवनदात्री
    गोदी थी सुरक्षित
    आज वही माँ
    ढूँढती एक कांधा
    पल भर रोने को.
    SPEECHLESS........

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  15. माँ का दर्द शब्‍दों से निकल आया। बहुत खूब।

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  16. बहुत बढ़िया तांका .

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  17. न शिकायत
    न शिकन माथे पे
    वह माँ ही है
    भगवान का रूप
    उत्कृष्ट वरदान.
    ...

    माँ कैसे तुम्‍हें
    एक शब्‍द मान लूँ
    दुनिया हो मेरी
    पूरी तुम ... माँ के बारे में जितना भी कहा जाये कम ही होता है

    मन को छूती प्रस्‍तुति आपकी
    आभार सहित

    सादर

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  18. मन को छू लेने वाली सभी पंक्तिया बहुत सुन्दर हैं..

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  19. जलती सदां
    परिवार चिंता में,
    मगर रोटी
    कभी नहीं जलती
    बनी माँ के हाथों की...

    हट तांका जैसे मन में अटक के रह गया ... मन को छू लेने वाले .... बहुत ही सुन्दर ...

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  20. हृदयस्पर्शी।सच्चाई तो यही है। फिर भी माँ-बाप उसी में आनंदित होते रहते हैं जिनमें उनके बच्चे खुश हैं।

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  21. बहुत ही सुन्दर पोस्ट|

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  22. संबंधों की विडंबना को स्वर देतीं हृदयस्पर्शी पंक्तियां।

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  23. आज की यही सच्चाई है ..बहुत सुन्दर रचना

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  24. सच्चाई को कहती हर क्षणिका बहुत मार्मिक

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  25. दिल से लिखी गई सुंदर अभिव्यक्ति बहुत खूब कैलाश जी ।

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  26. बेशक़ीमती पंक्तियां हैं। कहीं संदर्भ देने के काम आएंगी।

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  27. वाह बहुत खूब जी ..बहुत खूब

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  28. सर बहुत ही सुन्दर क्षणिकाएं |मन को छू लेने वाली संवेदना |आभार

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  29. कड़वी सच्चाई बयां करती...बेहतरीन रचना।।।

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  30. बेहतरीन और भावपूर्ण संकलन ..


    सुन्दर साहित्य सृजन के लिए साधुवाद।।।धन्यवाद

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  31. Dear follower friend iam hear to say thanks for all support…ur support my success…Keep writing & reading…waiting to hear more…good luck…GOD<3U

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  32. भावपूर्ण प्रस्तुति । बधाई ।

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  33. भावपूर्ण प्रस्तुति । बधाई ।

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  34. आपकी यह सुन्दर रचना दिनांक 18.10.2013 को http://blogprasaran.blogspot.in/ पर लिंक की गयी है। कृपया इसे देखें और अपने सुझाव दें।

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