Wednesday, April 24, 2013

इंसानियत कराह रही अब मेरे शहर में


                                  (चित्र गूगल से साभार)

दहशतज़दा है हर चेहरा मेरे शहर में,
इंसान नज़र आते न अब मेरे शहर में.

अहसास मर गए हैं, इंसां हैं मुर्दों जैसे,
इक बू अज़ब सी आती है मेरे शहर में.

हर नज़र है कर जाती चीर हरण मेरा,
महफूज़ नहीं गलियां अब मेरे शहर में.

घर हो गए मीनारें, इंसान हुआ छोटा,
रिश्तों में न हरारत, अब मेरे शहर में.

लब भूले मुस्कराना, तन्हाई है आँखों में,
मिलते हैं अज़नबी से सब मेरे शहर में.

दौलत है छुपा देती हर ऐब है इंसां का,
इंसानियत कराह रही अब मेरे शहर में.

.....कैलाश शर्मा 

43 comments:

  1. हर नज़र है कर जाती चीर हरण मेरा,
    महफूज़ नहीं गलियां अब मेरे शहर में...

    सच कहा है ... शर्म आने लगी है अब अपने शहर को भी पहचानने में .... बहुत ही लाजवाब गज़ल है ...

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  2. वाह आदरणीय वाह वर्तमान परिस्थिति का बहुत ही सुन्दरता से वर्णन किया है आपने, बेहद सटीक कटु सत्य. ह्रदय की पीड़ा बयां कर दी आपने.

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  3. अज़नबी से सब................

    दौलत है छुपा देती हर ऐब है इंसां का,
    इंसानियत कराह रही अब मेरे शहर में...............वर्तमान कटु सत्‍य।

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  4. आज शहरों में दम तोडती संवेदनाओं का मर्मस्पर्शी चित्रण!

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  5. वर्तमान यथास्थिति का सटीक चित्रण...

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  6. आज की स्थिति का सही जायजा पेश करती सुंदर गज़ल

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  7. लब भूले मुस्कराना, तन्हाई है आँखों में,
    मिलते हैं अज़नबी से सब मेरे शहर में.
    शहरीकरण सब छीन रहा है हमसे ....और हम हैं कि छिनने दे भी रहे हैं ...
    यथार्थ कहती सुन्दर रचना ...!!

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  8. कैसे यह सब देखा जाये,
    रात अँधेरा घिरता जाये।

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  9. बहुत बढ़िया...
    लब भूले मुस्कराना, तन्हाई है आँखों में,
    मिलते हैं अज़नबी से सब मेरे शहर में.

    मन को छूती गुज़र गयी ग़ज़ल...
    सादर
    अनु

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  10. मन की बेकली को बहुत खूबसूरत अल्फाजों में ढाला है कैलाश जी ! बहुत बढ़िया गज़ल है ! दाद कबूल करें !

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  11. दिल में छाए असमंजस को सुन्दर शब्द देती रचना !!

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  12. आपकी यह प्रस्तुति कल के चर्चा मंच पर है
    कृपया पधारें

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  13. आज के भयावह और दर्दनाक हालात बयां करती आपकी हर पंक्ति ....

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  14. विकास के नाम पर सब कुछ छीन रहा है यह शहर... सटीक अभिव्यक्ति... आभार

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  15. हर नज़र है कर जाती चीर हरण मेरा,
    महफूज़ नहीं गलियां अब मेरे शहर में----

    वाकई वर्तमान का सच है,बहुत मार्मिक अंदाज में
    बयां करती रचना
    गहन अनुभूति
    बधाई

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  16. हम सभी मृतप्राय से हो गए हैं. इंसान कोई बचा नहीं, जो है सभी आत्माविहीन मानव...

    अहसास मर गए हैं, इंसां हैं मुर्दों जैसे,
    इक बू अज़ब सी आती है मेरे शहर में.

    ससामयिक चिंतन. सभी शेर बहुत उम्दा. शुभकामनाएं.

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  17. आपकी यह बेहतरीन रचना शनिवार 27/04/2013 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

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  18. वर्त्तमान परिस्थिति का हुबहू चित्रण करती रचना

    latest post बे-शरम दरिंदें !
    latest post सजा कैसा हो ?

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  19. अच्‍छी रचना।

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  20. वाकई ऐसा ही भय है आजकल है ..किस गली किस नुक्कड़ पर कोई भेडिया खड़ा हो. सुन्दर अभिव्यक्ति.

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  21. सोचने पर मजबूर करती हुई एक बेहतरीन ग़ज़ल...

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  22. behtareen rachna.....aaj ka sach bayan karti..

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  23. सही कहा आपने , अब किस पर विश्वास कीजिये

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  24. कैलाश जी,आज के हालात कुछ ऐसी ही तस्वीर दिखा रहे हैं..लेकिन वक्त बदलेगा..

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  25. हर नज़र है कर जाती चीर हरण मेरा,
    महफूज़ नहीं गलियां अब मेरे शहर में.
    इन्सान सब कुछ भूल गया है,भावना भी,संवेदना भी.अच्छी प्रस्तुति

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  26. आज के बिगड़ते हालात पर बेहतरीन प्रस्तुति,आभार.

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  27. bahut sunder .kripya mere blog par bhi padharen aapka swagat hai.

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  28. yatharth ka sundar sateek chitran...

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  29. aapke gajal direct dil ko chhute hain...

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  30. लब भूले मुस्कराना, तन्हाई है आँखों में,
    मिलते हैं अज़नबी से सब मेरे शहर में.
    सही चित्रण आज की रुखी जिन्दगी की तस्वीर का .....
    शुभकामनायें!

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  31. बहुत खूब


    हम सब के बीच से संवेदनाएँ खत्म हो रही हैं ...तभी आज कल बलात्कार की घटनाएँ भी ज़ोर पकड़े हुए हैं

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  32. आज की सबसे बड़ी वेदना ही यही है कि संवेदना ही समाप्त हो गयी है ....

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  33. बहुत प्रभावी ग़ज़ल

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  34. बहुत सुन्दर.. प्रभावी ग़ज़ल..आभार

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  35. बहुत खूब |

    कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
    Tamasha-E-Zindagi
    Tamashaezindagi FB Page

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  36. बहुत अच्छी कविता...इंसानियत कराह रही है अब मेरे शहर में... आभार

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  37. अहसास मर गए हैं, इंसां हैं मुर्दों जैसे,
    इक बू अज़ब सी आती है मेरे शहर में.

    इंसानियत का बजूद बना रहे यही उम्मीद करनी चाहिये.

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  38. हर नज़र है कर जाती चीर हरण मेरा,
    महफूज़ नहीं गलियां अब मेरे शहर में.
    बहुत खूब !

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  39. सचबयानी के लिये वधाई !तभी तो समाज का दर्पण है |
    है इसकी बड़ी ग़ुरबत, आइना है मेरे हाथ में |
    इसकी तुझे ज़रूरत,आइना है मेरे हाथ में ||
    होता न यह अगर तो,सच सामने न आता-
    ले देख अपनी सूरत,आइना है मेरे हाथ में ||

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  40. घर हो गए मीनारें, इंसान हुआ छोटा

    पतन का यह सिला न जाने कहाँ थमेगा.अच्छी गज़ल.

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  41. दौलत है छुपा देती हर ऐब है इंसां का,
    इंसानियत कराह रही अब मेरे शहर में.

    बहुत खूब !

    बस कुछ बची कुची इंसानियत पर ही दुनिया टिकी है

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    तेरे मेरे प्यार का अपना आशियाना !!


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  42. वाह बहुत ही सुन्दर लिखा है आपने।

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