Sunday, June 16, 2013

पितृ दिवस

छोटी छोटी उंगलियों से 
पकड़ कर हाथ 
चलना सीखा पिता के साथ,
नहीं दे पाते थे छोटे छोटे पैर
पिता के क़दमों का साथ,
कर लेते अपने क़दम धीमे
देने बेटे के कदमों का साथ, 
थक जाने पर उठा लेते गोदी में
नहीं महसूस हुआ कभी बेटे का भार.

आज पिता के पैर
हो गए अशक्त
नहीं दे पाते साथ
बेटे के तेज़ क़दमों का,
बढ़ गया बेटा आगे
छोड़ कर अशक्त हाथ
जो बढे उसकी ओर
सहारे को.

नहीं देखा मुड़ कर
पीछे रह गये पिता को,
नहीं की कम गति
अपने क़दमों की,
कमज़ोर क़दमों का साथ देने.

शायद महसूस हो
उन्हें भी पिता का प्यार
जब हाथों को पकडे
छोटी उंगलियाँ
और साथ चलते छोटे क़दम,
बढ़ जायें आगे
अशक्त क़दमों को
पीछे छोड़ कर.

....कैलाश शर्मा

42 comments:

  1. कर लेते अपने क़दम धीमे
    देने बेटे के कदमों का साथ,
    नत नमन पिता जो आकाश से ऊँचा

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  2. बहुत ल्कुच सोचने को मजबूर कर गई आपकी रचना ...
    बदलते माहोल का दर्द पिता महसूस करते हैं आज ...

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  3. .विचारणीय भावों की अभिव्यक्ति आभार . बघंबर पहनकर आये ,असल में ये हैं सौदागर .
    आप भी जानें संपत्ति का अधिकार -४.नारी ब्लोगर्स के लिए एक नयी शुरुआत आप भी जुड़ें WOMAN ABOUT MAN "झुका दूं शीश अपना"

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  4. सच हैं जब तक खुद पर नहीं बीतती तब तक इंसान को किसी दूसरे का दर्द समझ नहीं आता। यथार्थ का आईना दिखती सार्थक भावपूर्ण रचना

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  5. आज के बच्चों की गति बहुत तेज है और वे उसमें समझौता नहीं करना चाहते हैं . पिता बीते कल की चीज हो चुकी है और उनके प्रति अब प्यार और सम्मान दिखने का भी वक़्त नहीं बचा है . बहुत कड़वे सच को उजागर किया आपने .

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  6. बहुत खूब कैलाश sir
    नमस्कार
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल सोमवार (17-06-2013) के :चर्चा मंच 1278 पर ,अपनी प्रतिक्रिया के लिए पधारें
    सूचनार्थ |

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  7. बहुत ही सुंदर, सोचने को विवश करती रचना, लेकिन आदमी जब तक खुद पिता बनकर समझता है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है, शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  8. सोचने को विवश करती रचना

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  9. बहुत सुंदर बात कही आपने , कई बार समय गुज़रने के बाद ही समझ आती है

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  10. पिता बनाने के बाद भी शायद बच्चे इन एहसास से नहीं गुज़र पाते .....

    जब ,
    हो जाएंगे अशक्त हाथ
    और कदम नहीं दे पाएंगे
    बेटे के कदमों का साथ
    तब ही याद आए शायद
    पिता के झुर्री पड़े हाथ ....

    बहुत सुंदर और सच को कहती मार्मिक अभिव्यक्ति

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  11. ब्लॉग बुलेटिन की फदर्स डे स्पेशल बुलेटिन कहीं पापा को कहना न पड़े,"मैं हार गया" - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  12. ब्लॉग बुलेटिन की फदर्स डे स्पेशल बुलेटिन कहीं पापा को कहना न पड़े,"मैं हार गया" - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  13. bahut hi badhiyan bhaav sir! padhkar accha laga!

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  14. पितृ दिवस को समर्पित बेहतरीन व सुन्दर रचना...
    शुभकामनायें...

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  15. पितृ दिवस की हार्दिक बधाई। एक भावुक रचना।। आभार।

    क्या आपको भी आते हैं इस तरह के ईनामी एसएमएस!!
    नया चिठ्ठा :- Knowledgeable-World

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  16. बहुत सुन्दर. आपने सच्चाई बयां की है

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  17. happy fathger day... behtreen prstuti....

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  18. थक जाने पर उठा लेते गोदी में
    नहीं महसूस हुआ कभी बेटे का भार.

    बहुत सुन्दर,,,शुभकामनायें.

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  19. पितृ-दिवस की बधाई !
    यही मनाती हूँ हम सभी जो पिछली पीढ़ी हो रहे हैं अपने हाथ-पैरों से कभी लाचार न हों -किसी पर भार न बनें !

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  20. तल्ख़ सचाई से रू ब रू कराती बहुत ही प्रभावशाली प्रस्तुति ! यह वाकई एक बहुत बड़ी त्रासदी है जिसका निदान होना ही चाहिये ! आभार कैलाश जी !

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  21. आपकी यह रचना कल सोमवार (17-06-2013) को ब्लॉग प्रसारण के "विशेष रचना कोना" पर लिंक की गई है कृपया पधारें.

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  22. ye sch draane lgta hai n hme bhi.....kbhi kbhi ?? pr iss sch ko aapne khoobsurat shbdon me piroya hai......kitni sahajta se sb kah diya aapne waaaaaah

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  23. बहुत ही संदेशपूर्ण पंक्तियाँ.

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  24. बहुत सुंदर। सभी माता-पिता कभी किसी के बच्चे रहे हैं ...

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  25. समझ आती है धीरे- धीरे !

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  26. इस कहानी का अंत
    कहीं पर न होगा
    आज हम कह रहें हैं
    कल कोई और कह रहा होगा .....???

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  27. सुन्दर ,सच कहा ....तब तक बहुत देर हो चुकी होती है ...

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  28. शायद महसूस हो
    उन्हें भी पिता का प्यार
    जब हाथों को पकडे
    छोटी उंगलियाँ
    और साथ चलते छोटे क़दम,
    बढ़ जायें आगे
    अशक्त क़दमों को
    पीछे छोड़ कर.

    कितनी सच्ची बात कही आपने ....
    सादर !

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  29. सच पिता ऐसे ही होते हैं
    पिता के जीवन का सार्थक स्वरूप यही है, कि हम उनके त्याग को अनदेखा
    कर देते हैं---
    सच्ची अनुभूति की रचना
    उत्कृष्ट प्रस्तुति
    सादर

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  30. उम्दा प्रस्तुति

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  31. जब हाथों को पकडे
    छोटी उंगलियाँ
    और साथ चलते छोटे क़दम,
    बढ़ जायें आगे
    अशक्त क़दमों को
    पीछे छोड़ कर.

    भावपूर्ण रचना

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  32. वाह.....बहुत सुन्दर।

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  33. छोटी उंगलियाँ
    और साथ चलते छोटे क़दम,
    बढ़ जायें आगे
    अशक्त क़दमों को
    पीछे छोड़ कर.
    ..................सुंदर बात कही आपने ,

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  34. thnx sir..its really nice.i love my father too.

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  35. niceeeeeeeeeeeeeee.....................

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