Tuesday, July 16, 2013

श्रीमद्भगवद्गीता-भाव पद्यानुवाद (५४वीं कड़ी)

                                  मेरी प्रकाशित पुस्तक 'श्रीमद्भगवद्गीता (भाव पद्यानुवाद)' के कुछ अंश: 

            तेरहवां अध्याय 
(क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभाग-योग-१३.२७-३४)

समत्व भाव से सब प्राणी में
परमात्मा को जो है देखता.
जो विनाश अविनाशी समझे
मुझे वस्तुतः वही देखता.  (१३.२७)

सम भाव से स्थित ईश्वर को 
सब में है जो समान समझता.
नष्ट स्वयं को न करे आत्म से 
वही परम गति प्राप्त है करता.  (१३.२८)

प्रकृति सभी कर्म करती है
आत्मा नहीं कर्म का कर्ता.
जो भी इसको जान है लेता
वही परम सत्य का ज्ञाता.  (१३.२९)

समस्त चराचर प्राणि भेद को
एक प्रकृति में स्थित है देखता.
ब्रह्म प्राप्त करता वह साधक 
प्रकृति में से ही विस्तार देखता.  (१३.३०)

है निर्गुण अनादि अव्यय परमेश्वर
यद्यपि निवास शरीर में होता.
फिर भी न वह कुछ कर्म है करता 
और न लिप्त कर्मफलों से होता.  (१३.३१)

जैसे आकाश सूक्ष्म होने से 
सर्वव्याप्त कर लिप्त न होता.
तदा शरीर में स्थित आत्मा 
गुण दोषों से लिप्त न होता.  (१३.३२)

जैसे एक सूर्य हे अर्जुन!
सम्पूर्ण लोक प्रकाशित करता.
वैसे ही स्वामी परमात्मा 
समस्त शरीर प्रकाशित करता.  (१३.३३)

अपने ज्ञान चक्षुओं द्वारा 
जो क्षेत्र क्षेत्रज्ञ का भेद जानता.
करता प्राप्त परम पद है वो 
प्रकृतिमुक्ति की युक्ति जानता.  (१३.३४)


**तेरहवां अध्याय समाप्त**

               ......क्रमशः

.....कैलाश शर्मा 

23 comments:

  1. गूढ़ ज्ञानोक्ति.....

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    1. बेहद सुन्दर प्रस्तुतीकरण ....!!
      आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल बुधवार (17-07-2013) को में” उफ़ ये बारिश और पुरसूकून जिंदगी ..........बुधवारीय चर्चा १३७५ !! चर्चा मंच पर भी होगी!
      सादर...!
      शशि पुरवार

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  2. श्रीमदभगवदगीता का इतना सरल और सहज पद्य-अनुवाद आश्चर्य चकित करने वाला है, इन गूढ सुत्रों का सहज भाषा में पढना परम शांति दायक लगता है, बहुत बहुत आभार व शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  3. बेहद सुन्दर कैलाश जी, श्रीमद्भगवद्गीता में ही जीवन का सार है आपका आभार।

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  4. बहुत उम्दा,सुंदर सहज पद्य अनुवाद,,,आभार

    RECENT POST : अभी भी आशा है,

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  5. बहुत सुंदर, शुभकामनाये

    यहाँ भी पधारे
    दिल चाहता है
    http://shoryamalik.blogspot.in/2013/07/blog-post_971.html

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  6. बहुत सुंदर ..... आत्मा का गहन ज्ञान समेटे हुये सुंदर अनुवाद

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  7. सुन्दर अनुवाद

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  8. आत्मसात करने वाले शब्द.

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  9. अनुनाद करता अनुवाद..

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  10. सुन्दर प्रस्तुति-
    आभार आदरणीय-

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  11. ग्यान का गहरा सागर...आभार

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  12. गूढ़ ज्ञान को सरल भाषा में लिखने का भागीरथी प्रयास को नमन है ...

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  13. बहुत सुंदर, शुभकामनाये
    यहाँ भी पधारे
    http://saxenamadanmohan.blogspot.in/

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  14. विश्व, ईश्वर और स्वयं की सापेक्षिक स्थिति..

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  16. जो समभाव से सब को देखता है
    वही मुझे देख पाता है बहुत ही सरल भाव से गीता अनुवाद.. बहुत सुंदर...

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  17. ज्ञान चक्षुओं को खोलने से ही परम मुक्ति संभव है... सुन्दर भाव पद, बधाई.

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  18. बहुत बहुत सुंदर

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