Friday, September 13, 2013

परीक्षा


कितना कठिन है
प्रतिदिन सामना करना
एक नयी परीक्षा का,
बिना किसी पूर्व सूचना
विषय या पाठ्यक्रम के.

निरंतर देते परीक्षाएं
थक गया तन व मन,
नहीं चाहता  देना
कोई और परीक्षा
पर नहीं कोई उपाय 
बचने का इससे.

स्वीकार  है अपनी नियति
नहीं शिकायत किसी परीक्षा से
और न ही कोई आकांक्षा
किसी अपेक्षित परिणाम की,
केवल है इंतज़ार
उस अंतिम परीक्षा का  
मिलेगी जब मुक्ति
सब परीक्षाओं से.

लेकिन अनिश्चित सदैव की तरह 
दिन उस अंतिम परीक्षा का भी.

.....कैलाश शर्मा 

40 comments:

  1. वाह क्‍या मर्म संजोया है आपने इस कविता में। अन्तिम परीक्षा जब मिलेगी मुक्ति परीक्षाओं से लेकिन अनिश्चित है यह भी। सुन्‍दर।

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  2. जीवन में है नित्य परीक्षा

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  3. आपके जिंदगी में वो पल कभी न आए
    सादर

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  4. सहमत हूँ आपके विचारों से और एक रचना बन पड़ी -

    छोड़ इन झमेलों को
    ये मेरे -तेरे रूपी वेलों को ।
    हे प्रभु मुझे ले चलो
    बस मुझे विश्राम दो ॥

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  5. bahut sundar likha ...sach hain har pal pariksha hi to hain ...namste bhaiya

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  6. सुंदर रचना...
    आप की ये रचना आने वाले शनीवार यानी 14 सितंबर 2013 को ब्लौग प्रसारण पर लिंक की जा रही है...आप भी इस प्रसारण में सादर आमंत्रित है... आप इस प्रसारण में शामिल अन्य रचनाओं पर भी अपनी दृष्टि डालें...इस संदर्भ में आप के सुझावों का स्वागत है...

    उजाले उनकी यादों के पर आना... इस ब्लौग पर आप हर रोज 2 रचनाएं पढेंगे... आप भी इस ब्लौग का अनुसरण करना।

    आप सब की कविताएं कविता मंच पर आमंत्रित है।
    हम आज भूल रहे हैं अपनी संस्कृति सभ्यता व अपना गौरवमयी इतिहास आप ही लिखिये हमारा अतीत के माध्यम से। ध्यान रहे रचना में किसी धर्म पर कटाक्ष नही होना चाहिये।
    इस के लिये आप को मात्रkuldeepsingpinku@gmail.com पर मिल भेजकर निमंत्रण लिंक प्राप्त करना है।



    मन का मंथन [मेरे विचारों का दर्पण]


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  7. शायद ये अनिश्चितता ही सही है...दिन निश्चित हो जाए तो जीने का रोमांच ही न ख़तम हो जाए....

    बढ़िया भाव...
    सादर
    अनु

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  8. जब तक जीवन है नित नई परीक्षाओं से गुजरना ही पड़ेगा,,,
    सुंदर सृजन ! बेहतरीन प्रस्तुति,

    RECENT POST : बिखरे स्वर.

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  9. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी का लिंक कल शनिवार (14-09-2013) को "यशोदा मैया है मेरी हिँदी" (चर्चा मंचः अंक-1368)... पर भी होगा!
    हिन्दी दिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  10. परीक्षा या परिणाम .......??? ...सुन्दर सृजन

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  11. नैराश्य पूर्ण भाव लिए यथार्थ को कहती अभिव्यक्ति

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  12. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!बढ़िया भाव...

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  13. यह ज़िंदगी की परीक्षा इतनी नहीं आसान
    एक आग का दरिया है और डूब क जानना है...ज़रा बिगड़ दिया हमने ग़ालिब का यह शेर माफी चाहते है :)
    लेकिन सच तो यही है। सुंदर भाव अभिव्यक्ति ...

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  14. आज की विशेष बुलेटिन हिंदी .... ब्लॉग बुलेटिन में आपकी इस पोस्ट को भी शामिल किया गया है। सादर .... आभार।।

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  15. जीवन के सत्य और एक इंसान की विवशता की कहानी कहती सी बहुत ही सारगर्भित रचना ! अति सुंदर !

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  16. सार्थक अभिव्यक्ति

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  17. अनिश्चित दिन उस प्रतीक्षा का !
    इसलिए कह गए श्रीकृष्ण बस कर्म पर ही तुम्हारा वश है !
    श्रेष्ठ चिंतन !

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  18. बहुत ही सुन्दर बेहतरीन प्रस्तुती,धन्यबाद।

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  19. कल 15/09/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद!

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  20. सच है अब रोज-रोज के संघर्ष और परीक्षाओं से मन उक्‍ताने लगा है। बहुत अच्‍छी कविता।

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  21. सुन्दर. परीक्षाएं तो निरंतर चलती रहती हैं

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  22. बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा कल - रविवार - 15/09/2013 को
    भारत की पहचान है हिंदी - हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः18 पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया आप भी पधारें, सादर .... Darshan jangra





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  23. ये तो जीवन का खेल है ... सांसों की आँख मिचौली जो चलती रहेगी उम्र भर ...
    कभी न खत्म होने वाली परीक्षा उसके दरबार पे जा के ही खत्म होती है ... भाव मय रचना ...

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  24. gahan abhivyakti.. bohat sundar likha hai dada

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  25. अंतिम परीक्षा भी अंतिम नहीं है..एक नया दौर अगले ही क्षण शुरू हो जाता है..

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  26. ये सारी परीक्षाएं सिलेबस के बाहर की हैं...और हमेशा हमें चाक-चौबंद रखतीं हैं...

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  27. shayad jeenay ka maza hai in parichaon say....sundar rachna

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  28. बहुत ही गहन भाव के साथ अभिव्यक्ति ...

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  29. लेकिन अनिश्चित सदैव की तरह
    दिन उस अंतिम परीक्षा का भी.
    Kitna sach kaha hai!Us antim dintak har roz hame na jane kitne imtehanon se guzarna padta hai!

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  30. true..
    everyday a new test
    new enemy and new opponent.

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  31. मर्म को झंकृत करता कविता का मर्म..

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  32. मुक्ति प्रभु की शरण में जाने से मिलेगी इंतज़ार करने से

    नहीं मन बुद्धि उसके अर्पण कर दो।

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  33. बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लागर्स चौपाल में शामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा कल - शनिवार हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल :007 http://hindibloggerscaupala.blogspot.in/ लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया आप भी पधारें, सादर ..

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