Saturday, September 21, 2013

तलाश मेरे ‘मैं’ की

ढूँढता अपना अस्तित्व मेरा ‘मैं’
जो खो गया कहीं
देने में अस्तित्व अपनों के ‘मैं’ को.

अपनों के ‘मैं’ की भीड़
बढ़ गयी आगे
चढ़ा कर परत अहम की
अपने अस्तित्व पर,
छोड़ कर पीछे उस ‘मैं’ को
जिसने रखी थी आधार शिला
उन के ‘मैं’ की.

सफलता की चोटी से
नहीं दिखाई देते वे ‘मैं’
जो बन कर के ‘हम’
बने थे सीढ़ियां
पहुँचाने को एक ‘मैं’
चोटी पर.
भूल गए अहंकार जनित
अकेले ‘मैं’ का
नहीं होता कोई अस्तित्व
सुनसान चोटी पर.

काश, समझ पाता मैं भी
अस्तित्व अपने ‘मैं’ का
और न खोने देता भीड़ में
अपनों के ‘मैं’ की,
नहीं होता खड़ा आज
विस्मृत अपने ‘मैं’ से
अकेले सुनसान कोने में.


अचानक सुनसान कोने से
किसी ने पकड़ा मेरा हाथ
मुड़ के देखा जो पीछे
मेरा ‘मैं’ खड़ा था मेरे साथ
और समझाया अशक्त अवश्य हूँ
पर जीवित है स्वाभिमान 
अब भी इस ‘मैं’ में.
स्वाभिमान अशक्त हो सकता
कुछ पल को
पर नहीं कुचल पाता इसे
अहंकार किसी ‘मैं’ का,
नहीं होता कभी अकेला ‘मैं’
स्वाभिमान साथ होने पर.


....कैलाश शर्मा 

43 comments:

  1. कैलाश जी हिट्स ऑफ इसके लिए ……. जीवन के गहन अनुभव से निकली ये पोस्ट शानदार है |

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  2. बहुत सुन्दर पोस्ट

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  3. बहुत खूब,गहन भाव लिए सुंदर रचना !

    RECENT POST : हल निकलेगा

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  4. बढ़िया प्रस्तुति है आदरणीय-
    आभार आपका-

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  5. मैं को स्वाभिमान का साथ मिले, अहंकार से दूर रहे तो बात ही क्या हो!

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  6. आपने लिखा....हमने पढ़ा....
    और लोग भी पढ़ें; ...इसलिए आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल में शामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा {रविवार} 22/09/2013 को जिंदगी की नई शुरूवात..... - हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल – अंकः008 पर लिंक की गयी है। कृपया आप भी पधारें, आपके विचार मेरे लिए "अमोल" होंगें। सादर ....ललित चाहार

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  7. बहुत खूब,गहन भाव लिए सुंदर रचना कैलाश जी।

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  8. किन्‍हीं 'मैं' के मौलिक-अमौलिक तथा नैतिक-अनैतिक गठबन्‍धन से उपजी परिस्थितियों पर कवि 'मैं' की विचारणीय दृष्टि पड़ती है तो एक क्षण को तो वह उदास, हताश होता है। परन्‍तु शीघ्र ही अपने स्‍वाभिमान को पा कर आशावान, तटस्‍थ हो जाता है। ....................गूढ़ाभिव्‍यक्ति।

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  9. बहुत खूब,गहन भाव लिए सुंदर रचना !

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  10. बहुत सुन्दर,गहन भाव....

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  11. आत्मा मंथन का निचोड़ ...अभिव्यक्ति बेजोड़. बहुत सुन्दर रचना.

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  12. नहीं होता कभी अकेला ‘मैं’
    स्वाभिमान साथ होने पर.

    एक सम्पूर्ण जीवन दर्शन के साथ बहुत ही सारगर्भित एवं सार्थक रचना ! बहुत सुंदर !

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  13. बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति

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  14. नमस्कार आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (22-09-2013) के चर्चामंच - 1376 पर लिंक की गई है कृपया पधारें. सूचनार्थ

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  15. बहुत उत्तम सही कहा -स्वाभिमान के संग मैं बन जाता है आत्माभिमान होकर निरभिमान।

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  16. बहुत सुन्दर पोस्ट

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  17. sundar bhav....man ki baat keh di apne

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  18. बहुत सुंदर ...मेरे भी ब्लॉग पर आये

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  19. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति .. आपकी इस रचना के लिंक की प्रविष्टी सोमवार (23.09.2013) को ब्लॉग प्रसारण पर की जाएगी, ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया पधारें .

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  20. अपने 'मैं' की तलाश ..अति सुन्दर कृति..

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  21. पर नहीं कुचल पाता इसे
    अहंकार किसी ‘मैं’ का,
    नहीं होता कभी अकेला ‘मैं’
    स्वाभिमान साथ होने पर.-----

    बहुत सुंदर और सार्थक सच की अभिव्यक्ति

    सादर

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  22. बहुत सुन्दर 'मैं' की विवेचना ,गहन भाव!
    Latest post हे निराकार!
    latest post कानून और दंड

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  23. जीवन में निरंतर सफलता पूर्वक आगे बढ़ते रहने के लिए इस "मैं" का होना उतना ही आवश्यक है जितना शरीर के लिए प्राणों का होना। सार्थक एवं गहन भावभिव्यक्ति।

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  24. पर नहीं कुचल पाता इसे
    अहंकार किसी ‘मैं’ का,
    नहीं होता कभी अकेला ‘मैं’
    स्वाभिमान साथ होने पर.............बहुत सुन्दर

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  25. जब 'मैं 'था तब हरि नही ,अब हरि हैं 'मैं 'नाहि ...। कुछ जटिल लेकिन 'मैं' का अच्छा विश्लेषण ।

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  26. जब 'मैं 'था तब हरि नही ,अब हरि हैं 'मैं 'नाहि ...। कुछ जटिल लेकिन 'मैं' का अच्छा विश्लेषण ।

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  27. नहीं होता कभी अकेला ‘मैं’
    स्वाभिमान साथ होने पर.

    .......... बहुत ही सारगर्भित एवं सार्थक रचना !

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  28. नहीं होता कभी अकेला ‘मैं’
    स्वाभिमान साथ होने पर................
    aur hmare pas hai hi kya... ????????

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  29. कल 26/09/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद!

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  30. अहम का भाव शक्ति देता रहता है।

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  31. आदरणीय कैलाश जी,
    इस रचना में काफी गहराई छिपी है दो बार पुरी पढ़ने पर इसका अंदाज कर पाया, आपको इस रचना की अनेक बधाई।

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  32. नही होता अकेला मै स्वाभिमान के साथ होने पर। सुंदर सच्ची अभिव्यक्ति।

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  33. स्वाभिमान भुलाया नहीं जा सकता ...

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  34. ''मैं'' में मैं को तलाशने की शुरुआत

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  35. सम्मान का स्वाभिमान का "मैं" ,
    तलाश लो स्वयं "मैं" .....
    निराकरण " हम " का सागर बन कर मिलता है | साधो... आ.कैलाश जी ..|

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