Saturday, November 23, 2013

क्षितिज

भूल कर ज़मीन पैरों तले
और सिर ऊपर आसमान,
विस्मृत कर रिश्ते और संबंध
बढ़ता गया आगे 
छूने की चाह में 
आकांक्षाओं का क्षितिज।

जब भी बढाया हाथ 
छूने को क्षितिज
पाया उसे उतना ही दूर 
जितना यात्रा के प्रारंभ में।

खड़ा हूँ आज 
उसी ज़मीन पर 
उसी आसमान तले
जूझता अकेलेपन से 
क्षितिज से दूर।


....कैलाश शर्मा  

31 comments:

  1. nc / sr
    ------------------- kal likha tha kuch -----http://sowaty.blogspot.in/2013/11/blog-post_22.html

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  2. भूत से प्रताड़ित और भविष्‍य की खोज में 'वर्तमान' का आनन्‍द नहीं ले सकनेवालों के लिए एक प्रेरणा है यह कविता।

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  3. ऐसा ही तो होता है, बहुत कुछ पाने की चाह में हम अक्सर ऐसा कुछ खोते चले जाते हैं कि अंत में शेष रह जाता है, केवल अकेला पन...भावपूर्ण अभिव्यक्ति।

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  4. बढ़ता गया आगे
    छूने की चाह में
    आकांक्षाओं का क्षितिज।
    .... भावमय करते शब्‍दों का संगम

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  5. ठीक कहा आपने .....दूर..बहुत दूर .....छूने को जीवन कम है ?

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  6. आकांक्षाओं की दौड़ में मानव रिश्तों से कट जाता है...सुन्दर रचना...

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  7. हर चीज पाने कि चाह में बहुत कुछ छूट जाता है ....
    बेहद खूबसूरत पंक्तियां..!!

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  8. कुछ पाने कि चाह और कुछ छूटने का गम...
    भावपूर्ण अभिव्यक्ति....
    :-)

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  9. बहुत अर्थपूर्ण रचना

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  10. बहुत बढ़िया रचना सर , धन्यवाद

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  11. ये अकेलापन और क्षितिज को छूने की चाह ..... जीवन इसी दोराहे में उलझा रह जाता है ....

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  12. यही कोशिश धरा के आनंद से वंचित कर देता है.जरूरी है धरती पर का आनंद ना छूट पाए. बहुत सुन्दर रचना.

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  13. अधूरी आकांक्षाओं के प्रतिफलित ना हो पाने की पीड़ा को बखूबी बयान करती बहुत सुंदर सार्थक प्रस्तुति ! बहुत उत्कृष्ट रचना !

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  14. यही तो होता है.. पर समझने में पूरा जीवन बीत जाता है ..सुन्दर रचना.

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  15. जीवन यात्रा का सार ...बहुत सुन्दर तरीके से बताया सर आपने

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  16. बहुत ही गहन अभिव्यक्ति, शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  17. सुन्दर रचना......

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  18. कुछ पाने की चाह अक्सर भ्रम के जाल में उलझा देती है ... फिर थकान ही मिलती है ... शिखर तो वहीं रहता है ...

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  19. ममर्स्पर्शी .... जीवन के कितने रंग हैं जाने

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  20. beautiful..
    छूने की चाह में
    आकांक्षाओं का क्षितिज.. it's limitless, keep expanding... going further n further !!

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  21. जब भी बढाया हाथ
    छूने को क्षितिज
    पाया उसे उतना ही दूर
    जितना यात्रा के प्रारंभ में।

    क्षितिज दूर है तभी तो उसमें आकर्षण है..यहाँ जो मिल जाता है वह अनचाहा हो जाता है..

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  22. बहुत खूब, लाजवाब रचना।

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  23. आकांक्षाओं के क्षितिज पर हद से ज़्यादा ऊँची उड़ान भरने पर अकेलापन ही हाथ आता है...अक्सर...
    बहुत सुंदर अभिव्यक्ति सर!

    ~सादर!!!

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  24. वाह बहुत ही सुन्दर |

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  25. खड़ा हूँ आज
    उसी ज़मीन पर
    उसी आसमान तले
    जूझता अकेलेपन से
    क्षितिज से दूर।

    वाह !!! बहुत सुंदर और प्रभावशाली रचना
    सादर

    आग्रह है--
    आशाओं की डिभरी ----------

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  26. खड़ा हूँ आज
    उसी ज़मीन पर
    उसी आसमान तले
    जूझता अकेलेपन से
    क्षितिज से दूर।
    बहुत सुंदर रचना

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  27. कल 28/11/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद!

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  28. बहुत बढ़िया ..

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  29. क्षितिज तो हमेश दूर है मृग -मरीचिका है !-बहुत सुन्दर रचना
    नई पोस्ट तुम

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