Monday, April 20, 2015

सीढ़ियां

बढ़ते ही कुछ आगे सीढ़ियों पर 
हो जाते विस्मृत संबंध व रिश्ते,
निकल जाते अनज़ान हो कर
बचपन के हमउम्र साथियों से 
जो खेल रहे क्रिकेट
नज़दीकी मैदान में।

खो जाती स्वाभाविक हँसी
बनावटी मुखोटे के अन्दर,
खो जाता अन्दर का छोटा बच्चा
अहम् की भीड़ में।
विस्मृत हो जातीं पिछली सीढ़ियां
जिनके बिना नहीं अस्तित्व
किसी अगली सीढ़ी का।

कितना कुछ खो देते
अपने और अपनों को,
आगे बढ़ने की दौड़ में।

...कैलाश शर्मा 

30 comments:

  1. वाह ....सटीक चित्रण

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  2. वाह ....सटीक चित्रण

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  3. बहुत सुंदर भाव ...बधाई ...सादर
    विस्मृत हो जातीं पिछली सीढ़ियां
    जिनके बिना नहीं अस्तित्व
    किसी अगली सीढ़ी का।

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  4. bahut sundar bhav ..saty hai jeevan bhi ek sidhi ke saman hai .....anhin ghumvdar path

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  5. सत्य है ! आगे सीढियाँ चढ़ते हुए पीछे कितना कुछ महत्वपूर्ण छूटता जाता है यह समय रहते कहाँ समझ पाता है इंसान ! अत्यंत गहन एवं चिंतनीय अभिव्यक्ति !

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  6. बहुत सुन्दर

    सीढी चढ्ते समय लोगो से व्यवहार ये सोच कर करना चाहिये कि लौट्ते समय यही लोग रास्ते मे मिलेगे

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  7. पीछा समेटते हुए आगे बढ़ना चाल को धीरे कर देता है पर रिश्तों को मजबूत ... पर आज की रेस में कोई इसे देखना नहीं चाहता ... गहरी रचना ...

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  8. आज के आपा-धापी जीवन का जीवंत प्रस्तुतिकरण, इस सुंदर रचना पर आपको बधाई

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  9. सच ही है आगर चलते चलते बहुत कुछ छूट जाता है पीछे

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  10. सच ही है आगर चलते चलते बहुत कुछ छूट जाता है पीछे

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  11. खो जाती स्वाभाविक हँसी
    बनावटी मुखोटे के अन्दर,
    खो जाता अन्दर का छोटा बच्चा
    अहम् की भीड़ में।

    वाह यथार्थ के करीब की अभिव्यक्ति।

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  12. खो जाती स्वाभाविक हँसी
    बनावटी मुखोटे के अन्दर,
    खो जाता अन्दर का छोटा बच्चा
    अहम् की भीड़ में।

    वाह यथार्थ के करीब की अभिव्यक्ति।

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  13. कभी कभार आगे बढ़ जाने पर वापिस लौटना नामुमकिन सा लगता हैं:-(
    अच्छी रचना सर!!

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  14. भावपूर्ण.
    अपने निजी आस्तित्व की खोज में
    अपनत्व के खम्डहरों पर चलते रहे
    बहुत देर हो जाएगी और---
    खंडहरों के भी रेगिस्तान हो जाएगें--

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  15. खो जाती स्वाभाविक हँसी
    बनावटी मुखोटे के अन्दर,
    खो जाता अन्दर का छोटा बच्चा
    अहम् की भीड़ में।
    बहुत सुंदर भावनायें और शब्द भी ...बेह्तरीन अभिव्यक्ति ...!!शुभकामनायें.

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  16. सही कहा। इस आगे बढ़ने की दौड़ में न जाने क्‍या-क्‍या छूट चुका है।

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  17. सचमुच अकेलेपन का कारण अहम ही तो है

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  18. क्या खोया क्या पाया ...सुन्दर ,सटीक यथार्थ विवेचन !

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  19. यही होता है - लेकिन जान-समझ कर भी इंसान कुछ कर नहीं पाता,कैसी बेबसी1

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  20. Very nice post.. & welcome to my new blog post

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  21. सच ही तो है। हमारे ही कितने साथी हमें छोड जाते हैं, या हम से छूट जाते हैं।

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  22. खो जाती स्वाभाविक हँसी
    बनावटी मुखोटे के अन्दर,
    खो जाता अन्दर का छोटा बच्चा
    अहम् की भीड़ में।
    और ये अंतर धीरे धीरे बढ़ता ही जाता है और जितना अंतर बढ़ता है उतना ही आदमी अकेला होता जाता है ! जब तक पीछे मुड़कर देखता है पुरानी सीढ़ियां , पुराने रिश्ते अदृश्य हो चुके होते हैं ! शानदार पंक्तियाँ आदरणीय शर्मा जी

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  23. आगे बढ़ने की दोड़ का शायद यही साइड इफैक्ट है सर। आगे बढ़ेगे तो अपने छूट जाएंगे और नहीं बढ़ेगे तो अपने छोड़ जाएंगे। क्या कहते हो सर जी? आपकी कविता बहुत पसंद आई सर जी।

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  24. आगे बढ़ने की दोड़ का शायद यही साइड इफैक्ट है सर। आगे बढ़ेगे तो अपने छूट जाएंगे और नहीं बढ़ेगे तो अपने छोड़ जाएंगे। क्या कहते हो सर जी? आपकी कविता बहुत पसंद आई सर जी।

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    1. यही तो विडम्बना है. लोग साथ चलना भूल गए हैं.

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  25. कितना सही कहा आपने कि आगे बढ़ने ही होड़ में हम कितना कुछ खो देते हैं।

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  26. सुन्दर व सार्थक रचना प्रस्तुतिकरण के लिए आभार..
    मेरे ब्लॉग की नई पोस्ट पर आपका इंतजार...

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  27. आगे बढने की दौड में कितना कुछ पीछे छूट जाता है.

    सुंदर प्रस्तुति.

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  28. सटीक प्रस्तुति

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  29. वाह आज के प्रतिस्पर्धा युग की सबसे कटु देन ,सादर प्रणाम आदरणीय सर जी ।

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