Friday, October 23, 2015

तलाश शून्य की

भटकता तलाश में शून्य की
घिर जाता और भी
अहम् के चक्रव्यूह में,
अपनी हर सोच
अपनी हर उपलब्धि 
कर देती जटिल और भी 
चक्रव्यूह के हर घेरे को।

अहम्  खींच देता रेखा
बीच में अहम् और 'मैं' के,
अहम् की ऊँची दीवारों में
विस्मृत हो जाता 'मैं' 
अंतस के किसी कोने में,
अहम् का चक्रव्यूह कर देता दूर
स्वयं अपने से और अपनों से
और डूबने लगता मन
असीम गह्वर में अतृप्त शून्य के।


तलाश शून्य की
जब होती प्रारंभ और अंत 'मैं' पर
होने लगती पहचान 
स्वयं अपने से और अपनों से
और अनुभव एक अद्भुत शून्य का
जहाँ खो देता अस्तित्व अहम् 
गहन शून्य 'मैं' के आह्लाद में।

...©कैलाश शर्मा

26 comments:

  1. अत्यंत गहन एवं सारपूर्ण अभिव्यक्ति ! शून्य की यह तलाश भला किसकी पूरी हुई है !

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  2. और अनुभव एक अद्भुत शून्य का
    जहाँ खो देता अस्तित्व अहम्
    गहन शून्य 'मैं' के आह्लाद में।
    ...मैं की ख़ुशी क्षणिक है यह हमें गहरे अनुभव से ही पता चलता है...
    बहुत सुन्दर अध्यात्मपरक प्रस्तुति

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  3. अद्भूत चिंतन, आपके इस उद्गार के लिये आपको कोटिश बधाई

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  4. गहन अभिव्यक्ति , बहुत उम्दा कविता

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  5. गहन विचारों की खूबसूरत काव्यात्मक अभिव्यक्ति ।बहुत खूब।

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  6. वाकई शून्य में खोजाना अपने आप को पा लेने जैसा होता है । गहन भाव अभिव्यक्ति।

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  7. अहम् खींच देता रेखा
    बीच में अहम् और 'मैं' के,
    अहम् की ऊँची दीवारों में
    विस्मृत हो जाता 'मैं'
    अंतस के किसी कोने में,
    अहम् का चक्रव्यूह कर देता दूर
    स्वयं अपने से और अपनों से
    और डूबने लगता मन
    असीम गह्वर में अतृप्त शून्य के।
    गहन अभिव्यक्ति , बहुत ​शानदार कविता

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  8. शुभ लाभ । Seetamni. blogspot. in

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  9. गहन अभिव्यक्ति, बहुत सुंदर भाव.

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  10. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (25-10-2015) को "तलाश शून्य की" (चर्चा अंक-2140) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  11. आपकी कवितायेँ बहुत अच्छी लगती हैं...इतनी गूढ़ बातें आप सरल शब्दों में कह जाते हैं..

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  12. अहम का मैं में प्रवेश समाप्त कर देता है अस्तित्व.

    भावपूर्ण रचना.

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  13. ‘मैं’ को पहचान लेने से शून्य की खोज पूर्ण हो जाती है।
    शून्यता का अहसास कराती बहुत अच्छी कविता ।

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  14. गहन भाव, उम्दा रचना

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  15. चल पनघट
    तूं चल पनघट में तेरे पीछे पीछे आता हूँ
    देखूं भीगा तन तेरा ख्वाब यह सजाता हूँ
    मटक मटक चले लेकर तू जलभरी गगरी
    नाचे मेरे मन मौर हरपल आस लगाता हूँ
    जब जब भीगे चोली तेरी भीगे चुनरिया
    बरसों पतझड़ रहा मन हरजाई ललचाता हूँ
    लचक लचक कमरिया तेरी नागिनरूपी बाल
    आह: हसरत ना रह जाये दिल थाम जाता हूँ

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  16. चल पनघट
    तूं चल पनघट में तेरे पीछे पीछे आता हूँ
    देखूं भीगा तन तेरा ख्वाब यह सजाता हूँ
    मटक मटक चले लेकर तू जलभरी गगरी
    नाचे मेरे मन मौर हरपल आस लगाता हूँ
    जब जब भीगे चोली तेरी भीगे चुनरिया
    बरसों पतझड़ रहा मन हरजाई ललचाता हूँ
    लचक लचक कमरिया तेरी नागिनरूपी बाल
    आह: हसरत ना रह जाये दिल थाम जाता हूँ

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  17. विचारों की खूबसूरत काव्यात्मक अभिव्यक्ति ।बहुत खूब।

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  18. बहुत ही अच्छे से आपने एहम और मै को रचना में पिरो कर समझा दिया है । बहुत सुंदर ।

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  19. वक़्त
    ना जाने कब कैसे वक़्त बे साख्ता उड़ा
    जैसे पंख फैलाये आसमां में फाख्ता उड़ा
    मिट गयी ना जाने कैसी कैसी हस्तियां
    जब जब जिससे भी इसका वास्ता पड़ा
    बदलने चले थे कई सिकंदर और कलंदर
    ख़ाक हुए जिसकी राह मैं यह रास्ता पड़ा
    मत कर गुरूर अपनी हस्ती पर ऐ RAAJ
    कुछ पल उसे देदे सामने जो फ़कीर खड़ा

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  20. सटीकता के साथ लेखन संग मनोभावों का चित्रण |

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