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Saturday, November 28, 2015

क्षणिकाएं

कुछ दर्द, कुछ अश्क़,
धुआं सुलगते अरमानों का
ठंडी निश्वास धधकते अंतस की,
तेरे नाम के साथ
छत की कड़ियों की
अंत हीन गिनती,
बन कर रह गयी ज़िंदगी
एक अधूरी पेन्टिंग
एक धुंधले कैनवास पर।

*****

तोड़ने को तिलस्म मौन का
देता आवाज़ स्वयं को
अपने नाम से,
गूंजती हंसी मौन की
देखता मुझे निरीहता से
बैठ जाता फ़िर पास मेरे मौन से।

...©कैलाश शर्मा

Tuesday, November 17, 2015

ज़िंदगी है रक़ीब सी गुज़री

शाम भी शाम सी नही गुज़री,
रात भी याद में नही गुज़री।

आज भी हम खड़े रहे दर पर,
तू मगर राह से नही गुज़री।

कौन किसका हबीब हो पाया,
ज़िंदगी है रक़ीब सी गुज़री।

दर्द ने राह क्यूँ वही पकड़ी,
राह जिस पर ख़ुशी रही ठहरी।


तू न मेरी नज़र समझ पाया,
बात इतनी भी थी नही गहरी।

...©कैलाश शर्मा

Tuesday, November 03, 2015

क्षणिकाएं

उबलते रहे अश्क़
दर्द की कढ़ाई में,
सुलगते रहे स्वप्न
भीगी लकड़ियों से,
धुआं धुआं होती ज़िंदगी
तलाश में एक सुबह की
छुपाने को अपना अस्तित्व
भोर के कुहासे में।

*****

होते हैं कुछ प्रश्न
नहीं जिनके उत्तर,
हैं कुछ रास्ते 
नहीं जिनकी कोई मंजिल,
भटक रहा हूँ 
ज़िंदगी के रेगिस्तान में
एक पल सुकून की तलाश में, 
खो जायेगा वज़ूद
यहीं कहीं रेत में।

...©कैलाश शर्मा