Kashish - My Poetry
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Saturday, September 24, 2011
चाँद छुप जाओ बादलों में अभी
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चाँद छुप जाओ बादलों में अभी, कहीं ज़माने की तुम्हें नज़र न लगे। प्यार का अर्थ कहाँ समझा है इस दुनियाँ ने, पाक़ दामन...
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Friday, September 16, 2011
तलाश खुद की
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कितना अच्छा लगता है कभी खुद से खोकर खुद को ढूँढना. बीती हुई गलतियों पर एक निर्पेक्ष दृष्टिपात; गुजरे रास्तों से फिर से गु...
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Friday, September 09, 2011
आकांक्षा
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अन्तर्मन में तू रम जाये, सांस सांस तेरा गुण गाये। कण कण में तुझको मैं देखूँ, नज़र पराया कोई न आये। द्वेष न हो कोई भी मन में...
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