Pages

Sunday, April 24, 2011

मत मांगो मेरी आँखों के आँसू

     मत मांगो मेरी  आँखों के आँसू,
     प्यासा मन प्यासा रह जायेगा.


कितने सारे स्वप्न संजोये साथ तुम्हारे,
कितने  इन्द्रधनुष देखे  थे नदी  किनारे.
अंधकार ही सिर्फ़  धरोहर आज तुम्हारी,
कैसे सूरज को अर्पित कर दूं मैं अंधियारे.


मत छीनो मुझ से मेरे मन का सूनापन,
खुशियों का  कोलाहल ये न सह पायेगा.


साथ निभाने का वादा मैंने कब तुम से चाहा,
पर मेरी  आँखों  को  सपना  क्यों दिखलाया.
नहीं दोष  दे पाता मन  क्यों  तुम्हें आज भी,
शायद मेरा ही भ्रम था जिसने मन भटकाया.


ढूँढ  लिया  है उर ने  तुमको  इन  तारों  में,
देख तुम्हें यह भ्रमित कहीं फिर हो जायेगा.


लहर हवाले कर दी  अपनी जीवन नैया,
नहीं कोई  पतवार चाहिये, नहीं खिवैया.
आँसू के सागर से अब तो प्यार हो गया,
नहीं  चाह  कोई तट  पर यह पहुंचे नैया.


अब फिर खड़ा करो न मुझको दोराहे पर,
शायद कोई राह  न अब  उर चुन पायेगा.

47 comments:

  1. अब फिर खड़ा करो न मुझको दोराहे पर,
    शायद कोई राह न अब उर चुन पायेगा.

    बहुत बढ़िया बात कही है सर!


    सादर

    ReplyDelete
  2. वाह महाशय! कमाल की पंक्तियाँ हैँ।

    ReplyDelete
  3. नहीं दोष दे पाता मन क्यों तुम्हें आज भी,
    शायद मेरा ही भ्रम था जिसने मन भटकाया.
    बहुत - बहुत सुन्दर रचना... हर पंक्ति लाजवाब, बेमिसाल...

    ReplyDelete
  4. लहर हवाले कर दी अपनी जीवन नैया,
    नहीं कोई पतवार चाहिये, नहीं खिवैया ।
    आँसू के सागर से अब तो प्यार हो गया,
    नहीं चाह कोई तट पर यह पहुंचे नैया ।

    सुख से विमोह, दुख से अपनत्व...कविता की भावभूमि से यही स्वर प्रस्फुटित हो रहा है।
    इस अनुभूति से सभी का सामना कभी न कभी होता ही है।
    भावनामय गीत ने मन को प्रभावित किया।

    ReplyDelete
  5. कितने सारे स्वप्न संजोये साथ तुम्हारे,
    कितने इन्द्रधनुष देखे थे नदी किनारे.
    अंधकार ही सिर्फ़ धरोहर आज तुम्हारी,
    कैसे सूरज को अर्पित कर दूं मैं अंधियारे....

    Bahut hi bhaavna pradhaan geet hai ... aaj ke samay ka .. ekaaki man ka bhaav hai ...

    ReplyDelete
  6. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (25-4-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

    http://charchamanch.blogspot.com/

    ReplyDelete
  7. साथ निबाने का वादा कब मैंने तुमसे चाहा...

    मन की व्यथा का बेहतरीन चित्रण ।

    ReplyDelete
  8. priy sharma sahab ,
    rachana karunik bipannata ko dur karti huyi antarman ko udwelit karti hai --

    मत मांगो मेरी आँखों के आँसू,
    प्यासा मन प्यासा रह जायेगा.--------
    utkrisht srijan ke liye hriday se dhanyvad .

    ReplyDelete
  9. आदरणीय कैलाश शर्मा जी..
    नमस्कार !
    बहुत ही सुन्‍दर शब्‍दों....बेहतरीन भाव....खूबसूरत कविता...

    ReplyDelete
  10. साथ निभाने का वादा मैंने कब तुम से चाहा,
    पर मेरी आँखों को सपना क्यों दिखलाया.
    नहीं दोष दे पाता मन क्यों तुम्हें आज भी,
    शायद मेरा ही भ्रम था जिसने मन भटकाया.

    ऐसे हालत में अक्सर यही होता है ..लेकिन व्यक्ति वास्तविकता को समझते हुए भी अनजान बना रहता है ....आपने बहुत मार्मिकता से अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त किया है ...शुक्रिया

    ReplyDelete
  11. आँसू के सागर से अब तो प्यार हो गया,
    नहीं चाह कोई तट पर यह पहुंचे नैया ।
    यह पंक्तियाँ दिल को छू गयीं बहुत अच्छी सुन्दर रचना, बधाई.....

    ReplyDelete
  12. लहर हवाले कर दी अपनी जीवन नैया,
    नहीं कोई पतवार चाहिये, नहीं खिवैया.
    आँसू के सागर से अब तो प्यार हो गया,
    नहीं चाह कोई तट पर यह पहुंचे नैया.

    जीवन का निश्चिन्त विचरण।

    ReplyDelete
  13. लहर हवाले कर दी अपनी जीवन नैया,
    नहीं कोई पतवार चाहिये, नहीं खिवैया.
    आँसू के सागर से अब तो प्यार हो गया,
    नहीं चाह कोई तट पर यह पहुंचे नैया

    वाह ! कैलाश जी ,समर्पण का अहसास दिलाती शानदार भावपूर्ण अभिव्यक्ति की है आपने.यूँ लगता है भाव सागर में मानो बिलकुल डूब ही गएँ हैं आप.इसीलिए हमार दिल भी आंदोलित हो रहा है आपकी इस अनुपम प्रस्तुति से.
    मेरे ब्लॉग पर आयें ,रामजन्म पर दूसरी पोस्ट जारी कर दी है.

    ReplyDelete
  14. मन की व्यथा का बेहतरीन चित्रण|बहुत अच्छी सुन्दर रचना|

    ReplyDelete
  15. साथ निभाने का वादा मैंने कब तुम से चाहा,
    पर मेरी आँखों को सपना क्यों दिखलाया.
    नहीं दोष दे पाता मन क्यों तुम्हें आज भी,
    शायद मेरा ही भ्रम था जिसने मन भटकाया.

    यही तो प्यार है। प्रेम के भावों की सुन्दर अभिव्यक्ति। शानदार।

    ReplyDelete
  16. This comment has been removed by the author.

    ReplyDelete
  17. अब फिर खड़ा करो न मुझको दोराहे पर,
    शायद कोई राह न अब उर चुन पायेगा.

    extremely sentimental......

    ReplyDelete
  18. कितने सारे स्वप्न संजोये साथ तुम्हारे,
    कितने इन्द्रधनुष देखे थे नदी किनारे.
    अंधकार ही सिर्फ़ धरोहर आज तुम्हारी,
    कैसे सूरज को अर्पित कर दूं मैं अंधियारे....

    प्रेम के भावों की सुन्दर अभिव्यक्ति को प्रस्तुत किया है आपने इस गीत के माध्यम से. बहुत अच्छी सुन्दर रचना. बधाई.

    ReplyDelete
  19. कितने सारे स्वप्न संजोये साथ तुम्हारे,
    कितने इन्द्रधनुष देखे थे नदी किनारे.
    अंधकार ही सिर्फ़ धरोहर आज तुम्हारी,
    कैसे सूरज को अर्पित कर दूं मैं अंधियारे.

    बहुत सुन्दर, भावपूर्ण अभिव्यक्ति कैलाश जी।

    ReplyDelete
  20. व्यथा में भी आमन्त्रण .....बेहतरीन भाव ....आभार !

    ReplyDelete
  21. आँसू के सागर से अब तो प्यार हो गया,
    नहीं चाह कोई तट पर यह पहुंचे नैया.

    बेहद शानदार लाजवाब गीत.....

    ReplyDelete
  22. कितने सारे स्वप्न संजोये साथ तुम्हारे,
    कितने इन्द्रधनुष देखे थे नदी किनारे.
    अंधकार ही सिर्फ़ धरोहर आज तुम्हारी,
    कैसे सूरज को अर्पित कर दूं मैं अंधियारे....
    बहुत ही उम्दा ।

    ReplyDelete
  23. अब फिर खड़ा करो न मुझको दोराहे पर,
    शायद कोई राह न अब उर चुन पायेगा.

    गहन भाव........ प्रेम भी मन की वेदना भी..... बहुत सुंदर

    ReplyDelete
  24. बहुत खूबसूरत

    ReplyDelete
  25. ढूँढ लिया है उर ने तुमको इन तारों में,
    देख तुम्हें यह भ्रमित कहीं फिर हो जायेगा.

    खूबसूरत अभिव्यक्ति कैलाश जी!

    ReplyDelete
  26. मन को छूने वाली रचना, बधाई।

    ReplyDelete
  27. ह्रदय की गहन भावनाओं को उकेरती मर्मस्पर्शी रचना !

    ReplyDelete
  28. साथ निभाने का वादा मैंने कब तुम से चाहा,
    पर मेरी आँखों को सपना क्यों दिखलाया.
    नहीं दोष दे पाता मन क्यों तुम्हें आज भी,
    शायद मेरा ही भ्रम था जिसने मन भटकाया.

    बहुत खूब कहा है इन पंक्तियों में ।

    ReplyDelete
  29. sir
    prem aur virah ka abhootpoorv sanyojan , aapne shabo ko zindagi de di hai ..

    badhayi

    मेरी नयी कविता " परायो के घर " पर आप का स्वागत है .
    http://poemsofvijay.blogspot.com/2011/04/blog-post_24.html

    ReplyDelete
  30. "मत छीनो मुझ से मेरे मन का सूनापन,
    खुशियों का कोलाहल ये न सह पायेगा.".
    .. बहुत सुन्दर कविता और पंक्तियाँ.. छायावादी कविता के गुणों से संपन्न...

    ReplyDelete
  31. साथ निभाने का वादा मैंने कब तुम से चाहा,
    पर मेरी आँखों को सपना क्यों दिखलाया....

    कभी किसी को झूठे सपने नहीं देने चाहिए।

    .

    ReplyDelete
  32. मत मांगो मेरी आँखों के आँसू,
    प्यासा मन प्यासा रह जायेगा.--------

    लाजवाब .....

    ReplyDelete
  33. अब फिर खड़ा करो न मुझको दोराहे पर,
    शायद कोई राह न अब उर चुन पायेगा.
    man ko chhuti hui rachna kailash ji ..........

    ReplyDelete
  34. आँसू के सागर से अब तो प्यार हो गया,
    नहीं चाह कोई तट पर यह पहुंचे नैया...

    adhabhut..

    ReplyDelete
  35. मत छीनो मुझ से मेरे मन का सूनापन,
    खुशियों का कोलाहल ये न सह पायेगा.

    बहुत सुंदर रचना ! कभी कभी मन को अकेलेपन की, दुःख की, या उदासी की आदत हो जाती है ...

    ReplyDelete
  36. आँसू के सागर से अब तो प्यार हो गया,
    नहीं चाह कोई तट पर यह पहुंचे नैया.
    bahut bhavpoorn kavita

    ReplyDelete
  37. jab nirashao ke badal faile ho to aise hi man ke sagar se moti nikalte hain. ekaki man ki samvedansheel abhivyakti.

    ReplyDelete
  38. ढूँढ लिया है उर ने तुमको इन तारों में,
    देख तुम्हें यह भ्रमित कहीं फिर हो जायेगा.

    अब फिर खड़ा करो न मुझको दोराहे पर,
    शायद कोई राह न अब उर चुन पायेगा.

    बहुत सुन्दर लिखा है आपने......

    ReplyDelete
  39. शायद मेरा ही भ्रम था जिसने मुझको भटकाया ...
    प्रेम का यह निश्छल स्वरुप कि प्रिय पर कोई इलजाम ना आये , अद्भुत है !

    ReplyDelete
  40. कितने सारे स्वप्न संजोये साथ तुम्हारे,
    कितने इन्द्रधनुष देखे थे नदी किनारे.
    अंधकार ही सिर्फ़ धरोहर आज तुम्हारी,
    कैसे सूरज को अर्पित कर दूं मैं अंधियारे.


    मत छीनो मुझ से मेरे मन का सूनापन,
    खुशियों का कोलाहल ये न सह पायेगा.श्रद्धेय अग्रज शर्माजी बहुत ही सुंदर भावों से सजा यह गीत मन को भा गया बधाई और शुभकामनाएं

    ReplyDelete
  41. "लहर हवाले कर दी अपनी जीवन नैया,
    नहीं कोई पतवार चाहिये, नहीं खिवैया.
    आँसू के सागर से अब तो प्यार हो गया,
    नहीं चाह कोई तट पर यह पहुंचे नैया"

    दर्दीली पर लाजवाब रचना ।

    ReplyDelete
  42. बहुत भावप्रवण रचना |बधाई
    मेरे ब्लॉग पर आने के लिए आभार |
    आशा

    ReplyDelete
  43. लहर हवाले कर दी अपनी जीवन नैया,
    नहीं कोई पतवार चाहिये, नहीं खिवैया.
    आँसू के सागर से अब तो प्यार हो गया,
    नहीं चाह कोई तट पर यह पहुंचे नैया.
    .. बहुत सुन्दर कविता !!
    मेरी ओर से आपको हार्दिक शुभ कामनाएं

    ReplyDelete
  44. नीरज जी याद आ गए भाई जी ! शुभकामनायें !!

    ReplyDelete
  45. मत मांगो मेरी आँखों के आँसू,
    प्यासा मन प्यासा रह जायेगा...बहुत सुन्दर कविता ....हार्दिक शुभ कामनाएं....

    ReplyDelete