Kashish - My Poetry
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Thursday, September 30, 2010
मैं अपना घर ढूँढ रहा हूँ.......
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मन्दिर में भी मैं ही हूँ , मस्जिद में भी मैं ही हूँ। क्यों लड़ते हो मेरी खातिर , हर इन्सां में मैं ही हूँ। क्या नाम बद...
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Sunday, September 26, 2010
बेटी
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क्यों बेटा वारिस कहलाता, बेटी सिर्फ पराया धन, किसने देखा है, इनके अंतर्मन का अपनापन। क्यों होता है इतना अंतर, इनके लालन पालन में, क्यों हर...
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Friday, September 24, 2010
दीपक का दर्द
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जब तक तेल है दीपक में बाती भी जलती है , पतंगे भी चारों ओर मंडराते हैं , रोशनी की परछाईं भी नाचती और बतियाती हैं चारों ओ...
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Friday, September 17, 2010
मुझे घूंट देदो बस विष का ......
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क्यों करते हो आस निकालेगा कोई आकर के तुमको, उलझ गये हो जब अपने ही बुने हुए ताने बाने में. नहीं कोई भी कन्धा जिस पर सिर रख कर के तुम रो लेते....
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Saturday, September 11, 2010
अभी मरघट दूर है.........
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ठहर थोडा सुस्ताले, कब तक ढोता जायेगा, अपने जीवन की लाश अपने कन्धों पर, अभी मरघट दूर है........ रोता है, पागल, अपनी ही मौत पर कहीं रोया करते ...
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Thursday, September 02, 2010
कृष्ण को गुहार
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कहाँ खो गये हो मुरलीधर , ढूंढ़ रहे हैं भारतवासी । जय घो षों से गूंजें मंदिर , पर अंतर में गहन उदासी । नारी की है ...
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Friday, August 27, 2010
पीड़ा का उपहार दिया क्यों ......
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पीड़ा का उपहार दिया क्यों तुमने मेरे प्यासे उर को, माना तुमसे खुशियों का प्रतिदान नहीं माँगा था मैंने। फूल नहीं खिलते हर तरु पर,...
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