Pages

Tuesday, October 29, 2013

क्षणिकाएं

सिरहाने खड़े ख्वाब         
करते रहे इंतज़ार
आँखों में नींद का,
पर न विस्मृत हुईं यादें
और न थमे आंसू,
इंतज़ार में थके ख़्वाब
बह गये अश्क़ों के साथ 
छोड़ नयन तन्हा.

*****

सूखने लगीं पंखुडियां     
बिखरने लगे अहसास
थक गए पाँव,
तरसती है हथेली
पाने को एक छुवन
तुम्हारे हाथों की,
चुभने लगा है गुलाब
हथेली में काँटों की तरह 
एक तेरे इंतजार में.

*****

बहुत कोशिश की अंतस ने      
ढूँढने को सुकून
अपने अन्दर हर कोने में,
पर पसरा पाया
एक गहन सूनापन
अंधी गली की तरह.

जब न हो कोई चाह
या मंज़िल का उत्साह,
एक एक क़दम लगता भारी,
कितना कठिन होता
चलना सुनसान राहों पर
अनजान मंजिल की ओर.  


.....कैलाश शर्मा 

Tuesday, October 22, 2013

करवा चौथ

चाहे हो बेटी, पत्नी या माँ
क्यों आते औरत के ही हिस्से 
सभी व्रत और त्याग 
कभी बेटे और कभी पति के लिए
अहोई अष्टमी या करवा चौथ।
क्यूँ नहीं होता कोई व्रत या त्यौहार 
पुरुषों के लिए भी 
माँ या पत्नी की मंगलकामना को,
मदर्स या वेलंटाइन डे
बन कर रह गये केवल औपचारिकता,
कब तक होता रहेगा शोषण नारी का
त्याग विश्वास और प्रेम के नाम पर,
कब बन पायेगी सच में अर्धांगनी
और देंगे हम उसको
उसका उचित स्थान समाज में।

इंतज़ार है उस दिन का
जब मनायेंगे पुरुष त्यौहार
माँ या पत्नी की मंगलकामना को।

....कैलाश शर्मा

Tuesday, October 15, 2013

श्रीमद्भगवद्गीता-भाव पद्यानुवाद (५७वीं कड़ी)

                                    मेरी प्रकाशित पुस्तक 'श्रीमद्भगवद्गीता (भाव पद्यानुवाद)' के कुछ अंश: 
               

       चौदहवां  अध्याय 
(गुणत्रयविभाग-योग-१४.२१-२७)

अर्जुन 

उनके क्या लक्षण हैं भगवन 
जो त्रिगुणों से ऊपर उठ जाता.
कैसा है व्यवहार वह करता 
कैसे त्रिगुणों के पार है जाता.  (१४.२१)

श्री भगवान

ज्ञान, कर्म, मोह होने पर 
वह उनसे है द्वेष न करता.
होने पर निवृत्त है उनसे 
नहीं कामना उनकी करता.  (१४.२२)

साक्षी रूप से स्थिर होकर 
नहीं गुणों से विचलित होता.
केवल गुण ही कर्म कर रहे
ऐसा समझ न विचलित होता.  (१४.२३)

सुख दुःख में समान है रहता, 
लोहा, मिट्टी, सोना सम होता.
सम निंदा स्तुति प्रिय अप्रिय, 
बुद्धिमान गुणातीत वह होता.  (१४.२४)

मान अपमान बराबर जिसको,
सम व्यवहार मित्र शत्रु से होता.
करता परित्याग सभी कर्मों का
त्रिगुणों से ऊपर वह जन होता.  (१४.२५)

अनन्य भाव से जो मुझको 
पूर्ण भक्ति योग से भजता.
इन त्रिगुणों से परे है होकर 
ब्रह्मभाव का पात्र है बनता.  (१४.२६)

मैं ही अनश्वर ब्रह्म में स्थित
शाश्वत धर्म और अमृत भी.
अर्जुन मुझमें ही आश्रय समझो 
एकांतिक अखंड सुख का भी.  (१४.२७)

                .....क्रमशः

**चौदहवां अध्याय समाप्त**

...कैलाश शर्मा