Kashish - My Poetry
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Tuesday, November 17, 2015
ज़िंदगी है रक़ीब सी गुज़री
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शाम भी शाम सी नही गुज़री , रात भी याद में नही गुज़री। आज भी हम खड़े रहे दर पर , तू मगर राह से नही गुज़री। कौन किसका हबीब हो पाया...
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