Saturday, July 06, 2019

मेरी जीवन अभिलाषा हो


तुम संबल हो, तुम आशा हो,
तुम जीवन की परिभाषा हो।

शब्दों का कुछ अर्थ न होता,
उन से जुड़ के तुम भाषा हो।

जब भी गहन अँधेरा छाता,
जुगनू बन देती आशा हो।

जीवन मंजूषा की कुंजी,
करती तुम दूर निराशा हो।

नाम न हो चाहे रिश्ते का,
मेरी जीवन अभिलाषा हो।

...©कैलाश शर्मा

Wednesday, June 05, 2019

जीवन ऐसे ही चलता है


कुछ घटता है, कुछ बढ़ता है,
जीवन ऐसे ही चलता है।

इक जैसा ज़ब रहता हर दिन,
नीरस कितना सब रहता है।

मन के अंदर है जब झांका,
तेरा ही चहरा दिखता है।

चलते चलते बहुत थका हूँ,
कांटों का ज़ंगल दिखता है।

आंसू से न प्यास बुझे है,
आगे भी मरुधर दिखता है।

...©कैलाश शर्मा

Friday, May 03, 2019

क्षणिकाएं


गीला कर गया
आँगन फिर से,
सह न पाया
बोझ अश्क़ों का,
बरस गया।
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बहुत भारी है
बोझ अनकहे शब्दों का,
ख्वाहिशों की लाश की तरह।
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एक लफ्ज़
जो खो गया था,
मिला आज
तेरे जाने के बाद।
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रोज जाता हूँ उस मोड़ पर
जहां हम बिछुड़े थे कभी
अपने अपने मौन के साथ,
लेकिन रोज टूट जाता स्वप्न
थामने से पहले तुम्हारा हाथ,
उफ़ ये स्वप्न भी नहीं होते पूरे
ख़्वाब की तरह.

...©कैलाश शर्मा

Wednesday, April 17, 2019

बेटियां


यादों में जब भी हैं आती बेटियां,
आँखों को नम हैं कर जाती बेटियां।

आती हैं स्वप्न में बन के ज़िंदगी,
दिन होते ही हैं गुम जाती बेटियां।

कहते हैं क्यूँ अमानत हैं और की,
दिल से सुदूर हैं कब जाती बेटियां।

सोचा न था कि होंगे इतने फासले,
हो जाएंगी कब अनजानी बेटियां।

होंगी कुछ तो मज़बूरियां भी उसकी,
माँ बाप से दूर कब जाती बेटियां।

माँ बाप से दूर हों चाहे बेटियां,
लेकिन जगह दुआ में पाती बेटियां।

...©कैलाश शर्मा

Wednesday, March 27, 2019

शब्दों की चोट


बहुत आसान है फेंकना 
एक कंकड़ शब्द का 
और कर देना पैदा
लहरें अशांति की
अंतस के शांत जल में।

बिखरी हुई अशांत लहरें
यद्यपि हो जातीं शांत 
समय के साथ,
लेकिन कितना कठिन है
लगाना अनुमान गहराई का
जहाँ देकर गया चोट
वह फेंका हुआ कंकड़ झील में।

...©कैलाश शर्मा

Tuesday, March 12, 2019

मरुधर में बोने सपने हैं


कुछ दर्द अभी तो सहने हैं,
कुछ अश्क़ अभी तो बहने हैं।

मत हार अभी मांगो खुद से,
मरुधर में बोने सपने हैं।

बहने दो नयनों से यमुना,
यादों को ताज़ा रखने हैं।

नींद दूर है इन आंखों से,
कैसे सपने अब सजने हैं।

बहुत बचा कहने को तुम से,
गर सुन पाओ, वह कहने हैं।

कुछ नहीं शिकायत तुमने की,
यह दर्द हमें भी सहने हैं।

हमने मिलकर जो खाब बुने,
अब दफ़्न अकेले करने हैं।

...©कैलाश शर्मा

Thursday, February 14, 2019

क्षणिकाएं


जब भी पीछे मुड़कर देखा
कम हो गयी गति कदमों की,
जितना गंवाया समय
बार बार पीछे देखने में
मंज़िल हो गयी उतनी ही दूर 
व्यर्थ की आशा में।
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बदल जाते हैं शब्दों के अर्थ
व्यक्ति, समय, परिस्थिति अनुसार,
लेकिन मौन का होता सिर्फ एक अर्थ
अगर समझ पाओ तो।

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झुलसते अल्फाज़,
कसमसाते अहसास
होने को अभिव्यक्त,
पूछती हर साँस
सबब वापिस आने का,
केवल एक तुम्हारे न होने से।

...©कैलाश शर्मा