शाम भी शाम सी नही
गुज़री,
रात भी याद में नही गुज़री।
आज भी हम खड़े रहे दर पर,
तू मगर राह से नही गुज़री।
कौन किसका हबीब हो पाया,
ज़िंदगी है रक़ीब सी गुज़री।
दर्द ने राह क्यूँ वही पकड़ी,
राह जिस पर ख़ुशी रही ठहरी।
तू न मेरी नज़र समझ पाया,
बात इतनी भी थी नही गहरी।