Kashish - My Poetry
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Friday, December 18, 2015
जीवन घट रीत चला
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पल पल कर बीत चला , जीवन घट रीत चला। बचपन था कब आया , जाने कब बीत गया। औरों की चिंता में यौवन रस सूख गया। अब ...
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Monday, October 27, 2014
चौराहा
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चौराहे पर खड़ा हूँ कब से, भ्रमित चुनूँ मैं राह कौन सी। कौन राह मंज़िल को जाए, अंध गली ले जाय कौन सी। जितने पार किये चौराहे , नया...
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