Kashish - My Poetry
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Wednesday, March 23, 2011
बचपन ?
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पैरों पर चलना सीखते ही बढ़ गये पैर, माँगने को भीख या बेचने को गुलाब के फूल और गज़रा प्रेमियों को चौराहे पर, बरतन ...
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Thursday, March 17, 2011
कैसे कहूँ मनायें होली
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रंग खिले चहुँ और प्रकृति में सब कहते आया वसंत है. बोझ सिरों पर जब जीवन का, उनको कैसा, क्या वसंत है. मन में हो अल्हाद नहीं जब...
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Monday, March 14, 2011
यदि चाहो सदैव को प्रिय मैं रुक जाऊं
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यदि चाहो सदैव को प्रिय मैं रुक जाऊं, तो पहले समय पखेरू को बंदी कर लो. होता आया है...
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Friday, March 11, 2011
होली के रंग
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कुछ रंग होली के कितनी भी कोशिश करने पर धुल नहीं पाते उम्र भर. कितनी होली आयीं, कितने रंग लगे, पर कोई भी छुपा नहीं पाया उस रंग ...
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Sunday, March 06, 2011
जीने दो सिर्फ़ एक नारी बन कर
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कभी देवी बनाकर मन्दिर में सिंहासन पर बैठाया. समझ कर ज़ागीर कभी जूए में दांव पर लगाया. और कभी बनाकर सती जिंदा चिता में जलाया. कुच...
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Saturday, March 05, 2011
जन्मदिन की शुभकामनायें
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अभ्युदय के जन्मदिन पर नाना और नानी की हार्दिक शुभ कामनायें और आ शीर्वाद ...
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Friday, February 25, 2011
सूनापन
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खटखटाने को तरसता है दरवाज़ा, नहीं आती कोई कदमों की आहट भी, बैठे हुए कमरे में तक़ते हैं उदास नज़रों से एक दूसरे को, जानते हैं ...
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