Kashish - My Poetry
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Thursday, January 17, 2019
क्षणिकाएं
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मत बांटो ज़िंदगी दिन , महीनों व सालों में , पास है केवल यह पल जियो यह लम्हा एक उम्र की तरह। **** रिस गयी अश्क़ों में रिश्तों की...
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Friday, January 04, 2019
पली गैर हाथों यह ज़िंदगी है
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करीने से सज़ी कब ज़िंदगी है , यहां जो भी मिले वह ज़िंदगी है। सदा साथ रहती कब चांदनी है , अँधेरे से सदा अब बंदगी है। हमारी ज़िंद...
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Wednesday, December 12, 2018
क्षणिकाएं
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जियो हर पल को एक पल की तरह सम्पूर्ण अपने आप में , न जुड़ा है कल से न जुड़ेगा कल से। *** काश होता जीवन कैक्टस पौधे जैसा , अप्र...
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Saturday, December 01, 2018
क्षणिकाएं
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नहीं चल पाता सत्य आज अपने पैरों पर , वक़्त ने कर दिया मज़बूर पकड़ कर चलने को उंगली असत्य की। *** चलते नहीं साथ साथ हमारे दो पैर...
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Wednesday, May 02, 2018
अनकहे शब्द
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फंस जाते जब शब्द भावनाओं के अंधड़ में और रुक जाते कहीं जुबां पर आ कर , ज़िंदगी ले लेती एक नया मोड़। सुनसान पलों में जब भी ...
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Thursday, March 22, 2018
ज़िंदगी
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जग में जब सुनिश्चित केवल जन्म और मृत्यु क्यों कर देते विस्मृत आदि और अंत को, हो जाते लिप्त अंतराल में केवल उन कृत्यों में ज...
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Thursday, December 14, 2017
क्षणिकाएं
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ढलका नयनों से नहीं बढ़ी कोई उंगली थामने पोरों पर , गिरा सूखी रेत में खो दिया अपना अस्तित्व , शायद यही नसीब था मेरे अश्क़ों का। ...
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