Kashish - My Poetry
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अँधियारा
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अँधियारा
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Friday, July 03, 2015
जीवन
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कानों को फोड़ता शोर सन्नाटे का , चीत्कार दमित शब्दों की छुपी मौन अंतस में , चुभता आँखों में काला गहरा अंधियारा , मां...
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Tuesday, January 27, 2015
मुझको दूर बहुत है चलना
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थके क़दम कब तक चल पायें , मंज़िल नज़र नहीं आती है , जीवन का उद्देश्य नहीं बस केवल मील के पत्थर गिनना। सफ़र हुआ था शुरू ज़हाँ से कित...
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Saturday, October 04, 2014
अब मैंने जीना सीख लिया
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कर बंद पिटारा सपनों का, बहते अश्क़ों को रोक लिया. अंतस को जितने घाव मिले स्मित से उनको ढांक लिया. विस्मृत कर अब सब रिश्तों को, ...
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