Kashish - My Poetry
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Wednesday, June 05, 2019
जीवन ऐसे ही चलता है
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कुछ घटता है , कुछ बढ़ता है , जीवन ऐसे ही चलता है। इक जैसा ज़ब रहता हर दिन , नीरस कितना सब रहता है। मन के अंदर है जब झांका , ...
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Tuesday, April 18, 2017
क्षणिकाएं
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(1) चहरे पर जीवन के उलझी पगडंडियां उलझा कर रख देतीं जीवन के हर पल को , जीवन की संध्या में झुर्रियों की गहराई में ढूँढता हू...
25 comments:
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