Kashish - My Poetry
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Tuesday, June 07, 2016
ज़िंदगी कुछ ख़फ़ा सी लगती है
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ज़िंदगी कुछ ख़फ़ा सी लगती है , रोज़ देती सजा सी लगती है। रौनकें सुबह की हैं कुछ फीकी , शाम भी बेमज़ा सी लगती है। राह जिस पर चले थे ...
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Monday, January 04, 2016
ज़ब ज़ब शाम ढली
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ज़ब ज़ब शाम ढली , हर पल आस पली। ज़ीवन बस उतना , जब तक सांस चली। दिन गुज़रा सूना , तनहा शाम ढली। खुशियाँ कब ठहरी , कल पर बात ...
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Tuesday, November 17, 2015
ज़िंदगी है रक़ीब सी गुज़री
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शाम भी शाम सी नही गुज़री , रात भी याद में नही गुज़री। आज भी हम खड़े रहे दर पर , तू मगर राह से नही गुज़री। कौन किसका हबीब हो पाया...
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Sunday, January 11, 2015
आज ये दिन उदास सा गुज़रा
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आज ये दिन उदास सा गुज़रा, एक साया इधर से था गुज़रा। यूँ तो यह शाम वक़्त से आयी , क्यूँ है लगता कि दिन नहीं गुज़रा। रात भर सिल रहा ...
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