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Tuesday, June 07, 2016

ज़िंदगी कुछ ख़फ़ा सी लगती है

ज़िंदगी कुछ ख़फ़ा सी लगती है,
रोज़ देती सजा सी लगती है।

रौनकें सुबह की हैं कुछ फीकी,
शाम भी बेमज़ा सी लगती है।

राह जिस पर चले थे हम अब तक,
आज वह बेवफ़ा सी लगती है।

संदली उस बदन की खुशबू भी,
आज मुझको कज़ा सी लगती है।

दर्द जो भी मिला है दुनिया में,
यार तेरी रज़ा सी लगती है।

...© कैलाश शर्मा 

Monday, January 04, 2016

ज़ब ज़ब शाम ढली

ज़ब ज़ब शाम ढली,
हर पल आस पली।

ज़ीवन बस उतना,
जब तक सांस चली।

दिन गुज़रा सूना,
तनहा शाम ढली।

खुशियाँ कब ठहरी,
कल पर बात टली।

सूनी राह दिखी,
मन में पीर पली।

अपना कौन यहाँ,
झूठी आस पली।

मंज़िल दूर नहीं,
सांसें टूट चली।

...©कैलाश शर्मा

Tuesday, November 17, 2015

ज़िंदगी है रक़ीब सी गुज़री

शाम भी शाम सी नही गुज़री,
रात भी याद में नही गुज़री।

आज भी हम खड़े रहे दर पर,
तू मगर राह से नही गुज़री।

कौन किसका हबीब हो पाया,
ज़िंदगी है रक़ीब सी गुज़री।

दर्द ने राह क्यूँ वही पकड़ी,
राह जिस पर ख़ुशी रही ठहरी।


तू न मेरी नज़र समझ पाया,
बात इतनी भी थी नही गहरी।

...©कैलाश शर्मा

Sunday, January 11, 2015

आज ये दिन उदास सा गुज़रा

आज ये दिन उदास सा गुज़रा,
एक साया इधर से था गुज़रा।

यूँ तो यह शाम वक़्त से आयी,
क्यूँ है लगता कि दिन नहीं गुज़रा।

रात भर सिल रहा था गम अपने,
उनको पाया था फ़िर सुबह उधरा।

चांदनी खो गयी थी आँखों की,
चांद भी आज ग़मज़दा गुज़रा।

उम्र भर का हिसाब दूँ कैसे, 
एक पल उम्र से लंबा गुज़रा।

खो गयी जाने कहाँ लब की हंसी,
आज आँखों में है सन्नाटा पसरा।

          (अगज़ल/अभिव्यक्ति)
...कैलाश शर्मा