Kashish - My Poetry
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सन्नाटा
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Saturday, September 21, 2019
चादर सन्नाटे की
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चारों ओर पसरा है सन्नाटा मौन है श्वासों का शोर भी , उघाड़ कर चाहता फेंक देना चीख कर चादर मौन की, लेकिन अंतस का सूनापन खींच कर ...
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Friday, July 03, 2015
जीवन
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कानों को फोड़ता शोर सन्नाटे का , चीत्कार दमित शब्दों की छुपी मौन अंतस में , चुभता आँखों में काला गहरा अंधियारा , मां...
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Sunday, January 11, 2015
आज ये दिन उदास सा गुज़रा
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आज ये दिन उदास सा गुज़रा, एक साया इधर से था गुज़रा। यूँ तो यह शाम वक़्त से आयी , क्यूँ है लगता कि दिन नहीं गुज़रा। रात भर सिल रहा ...
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