Kashish - My Poetry
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Sunday, October 11, 2015
कुछ क़दम तो चलें
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एक दिन तो मिलें, कुछ क़दम तो चलें। राह कब एक हैं, मोड़ तक तो चलें। साथ जितना मिले, कुछ न सपने पलें। राह कितनी कठिन, अश्क़ ...
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Thursday, August 13, 2015
बंजारा
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जग से है क्यूँ मोह बढाता कौन हुआ किसका बंजारा। मिले काफ़िले उन्हें भुला दे कौन साथ चलता बंजारा। कौन रुका है यहाँ सदा को कौन ठां...
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