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Sunday, October 11, 2015
कुछ क़दम तो चलें
लेबल:
Kashish-My Poetry,
अगज़ल/अभिव्यक्ति,
अश्क़,
क़दम,
मोड़,
सपने
Thursday, August 13, 2015
बंजारा
जग से है क्यूँ मोह बढाता
कौन हुआ किसका बंजारा।
मिले काफ़िले उन्हें भुला दे
कौन साथ चलता बंजारा।
कौन हुआ किसका बंजारा।
मिले काफ़िले उन्हें भुला दे
कौन साथ चलता बंजारा।
कौन रुका है यहाँ सदा को
कौन ठांव होता अपना है।
सभी मुसाफ़िर हैं सराय में
एक एक सबको चलना है।
पल भर हाथ थाम ले काफ़ी
सदा साथ सपना बंजारा।
सभी मुसाफ़िर हैं सराय में
एक एक सबको चलना है।
पल भर हाथ थाम ले काफ़ी
सदा साथ सपना बंजारा।
अच्छा बुरा कौन है जग में
जो भी मिलता साथ उठाले।
कौन है अपना कौन पराया
जो भी मिलता गले लगाले।
छोड़ यहीं जब सब जाना है
क्यूँ है फ़िर चुनता बंजारा।
कौन है अपना कौन पराया
जो भी मिलता गले लगाले।
छोड़ यहीं जब सब जाना है
क्यूँ है फ़िर चुनता बंजारा।
आज़ नहीं, न कल था तेरा
आने वाला कल क्या होगा।
मेहंदी रचा हाथ में कोई
इंतज़ार कब करता होगा।
थके क़दम पर नहीं है रुकना
नियति तेरी चलना बंजारा।
मेहंदी रचा हाथ में कोई
इंतज़ार कब करता होगा।
थके क़दम पर नहीं है रुकना
नियति तेरी चलना बंजारा।
......©कैलाश शर्मा
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