Kashish - My Poetry
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Saturday, April 30, 2011
क्षणिकाएं
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(१) देख चुके जीवन में रंग सभी मौसम के, इंतज़ार है पतझड़ का, जो उड़ा कर ले जाये सूखे पीले पत्तों को कहीं दूर किसी...
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Sunday, April 24, 2011
मत मांगो मेरी आँखों के आँसू
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मत मांगो मेरी आँखों के आँसू, प्यासा मन प्यासा रह जायेगा. कितने सारे स्वप्न संजोये साथ तुम्हारे, कितने इन्द्रधनुष देखे थ...
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Monday, April 11, 2011
सपने
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पाने को छुटकारा मोड़ दिया था रुख रेतीले मरुधर में, पर कहाँ सूख पायी तेज़ धूप में भी सपनों की नदी, और उग आयी छोटी छोटी घास...
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Friday, April 08, 2011
आज उठानी ही होगी आवाज़
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आयी है आंधी एक बार फिर सत्याग्रह की, उखाड़ने को जड़ से उन ऊँचे कटीले वृक्षों को जो होते रहे पोषित भ्रष्टाचार और रिश्वत ...
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Sunday, April 03, 2011
मुश्किल नहीं जो उम्र अकेले ही कटे
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मैंने सब द्वार खुले रखे थे अपने घर के, बंद दर देख के खुशियाँ न कहीं मुड़ जायें. थक गयी चौखटें सुनसान डगर तकते हुए, बंद करती ...
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Wednesday, March 23, 2011
बचपन ?
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पैरों पर चलना सीखते ही बढ़ गये पैर, माँगने को भीख या बेचने को गुलाब के फूल और गज़रा प्रेमियों को चौराहे पर, बरतन ...
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Thursday, March 17, 2011
कैसे कहूँ मनायें होली
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रंग खिले चहुँ और प्रकृति में सब कहते आया वसंत है. बोझ सिरों पर जब जीवन का, उनको कैसा, क्या वसंत है. मन में हो अल्हाद नहीं जब...
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