Kashish - My Poetry
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Saturday, September 24, 2016
संवेदनहीनता
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दफ्न हैं अहसास मृत हैं संवेदनाएं, घायल इंसानियत ले रही अंतिम सांस सड़क के किनारे, गुज़र जाता बुत सा आदमी मौन करीब से. नहीं...
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Saturday, August 27, 2016
ज़िंदगी कुछ नहीं कहा तूने
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ज़िंदगी कुछ नहीं कहा तूने , मौन रह कर सभी सहा तूने। रात भर अश्क़ थे रहे बहते , पाक दामन थमा दिया तूने। लगी अनजान पर रही अपनी , ...
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Sunday, July 17, 2016
याद दे कर न तू गया होता
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काश तुमसे न मैं मिला होता , दर्द दिल में न ये पला होता। रौनकों की कमी न दुनिया में , एक टुकड़ा हमें मिला होता। आसमां में हज़ार त...
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Tuesday, June 07, 2016
ज़िंदगी कुछ ख़फ़ा सी लगती है
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ज़िंदगी कुछ ख़फ़ा सी लगती है , रोज़ देती सजा सी लगती है। रौनकें सुबह की हैं कुछ फीकी , शाम भी बेमज़ा सी लगती है। राह जिस पर चले थे ...
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Saturday, May 21, 2016
अप्प दीपो भव
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बुद्ध नहीं एक व्यक्ति विशेष बुद्ध है बोध अपने "मैं" का एक मार्ग पहचानने का अपने आप को, नहीं करा सकता कोई और पहचान मेरी मेरे...
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Wednesday, April 20, 2016
खून अपना सफ़ेद जब होता
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खून अपना सफ़ेद जब होता , दर्द दिल में असीम तब होता। दर्द अपने सदा दिया करते , गैर के पास वक़्त कब होता। रात गहरी सियाह जब होती ,...
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Thursday, February 18, 2016
क्षणिकाएं
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हर खिड़की दरवाज़े से आ जाते यादों के झोंके दे जाते कभी सिहरन ठंडक की कभी तपन लू की। बंद कर दीं सब खिड़कियाँ , दरव...
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