Kashish - My Poetry
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Monday, February 27, 2017
कैसी यह मनहूस डगर है
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भूल गयी गौरैया आँगन, मूक हुए हैं कोयल के स्वर , ठूठ हुआ आँगन का बरगद, नहीं बनाता अब कोई घर। लगती नहीं न अब चौपालें , शोर नहीं बच...
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Tuesday, January 31, 2017
क्षणिकाएं
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जीवन की सांझ एक नयी सोच एक नया दृष्टिकोण , एक नया ठहराव सागर की लहरों का , एक प्रयास समझने का जीवन को जीवन की नज़र से। ***** ...
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Thursday, November 24, 2016
समस्याएं अनेक, व्यक्ति केवल एक
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समस्याएँ अनेक उनके रूप अनेक लेकिन व्यक्ति केवल एक। नहीं होता स्वतंत्र अस्तित्व किसी समस्या या दुःख का , नहीं होती समस्या कभी सुप्त...
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Saturday, September 24, 2016
संवेदनहीनता
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दफ्न हैं अहसास मृत हैं संवेदनाएं, घायल इंसानियत ले रही अंतिम सांस सड़क के किनारे, गुज़र जाता बुत सा आदमी मौन करीब से. नहीं...
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Saturday, August 27, 2016
ज़िंदगी कुछ नहीं कहा तूने
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ज़िंदगी कुछ नहीं कहा तूने , मौन रह कर सभी सहा तूने। रात भर अश्क़ थे रहे बहते , पाक दामन थमा दिया तूने। लगी अनजान पर रही अपनी , ...
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Sunday, July 17, 2016
याद दे कर न तू गया होता
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काश तुमसे न मैं मिला होता , दर्द दिल में न ये पला होता। रौनकों की कमी न दुनिया में , एक टुकड़ा हमें मिला होता। आसमां में हज़ार त...
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Tuesday, June 07, 2016
ज़िंदगी कुछ ख़फ़ा सी लगती है
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ज़िंदगी कुछ ख़फ़ा सी लगती है , रोज़ देती सजा सी लगती है। रौनकें सुबह की हैं कुछ फीकी , शाम भी बेमज़ा सी लगती है। राह जिस पर चले थे ...
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