Kashish - My Poetry
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Thursday, August 27, 2015
शब्दों का मौन
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अंतस का कोलाहल रहा अव्यक्त शब्दों में , कुनमुनाते रहे शब्द उफ़नते रहे भाव उबलता रहा आक्रोश उठाने को ढक्कन शब्दों के मौन का। ब...
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Thursday, August 13, 2015
बंजारा
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जग से है क्यूँ मोह बढाता कौन हुआ किसका बंजारा। मिले काफ़िले उन्हें भुला दे कौन साथ चलता बंजारा। कौन रुका है यहाँ सदा को कौन ठां...
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Sunday, July 19, 2015
यादें
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कैसा था ज़ुनून दूर होने का तुम्हारी यादों से , दफ़ना दिए सब ख़्वाब कुचल दिया वह दिल जिसमें बसाया तुम्हें , खरोंच दी परतें ज़िस्म से पर...
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Friday, July 03, 2015
जीवन
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कानों को फोड़ता शोर सन्नाटे का , चीत्कार दमित शब्दों की छुपी मौन अंतस में , चुभता आँखों में काला गहरा अंधियारा , मां...
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Sunday, June 14, 2015
पगडंडी
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मत ढूंढो पगडंडियां बनायी औरों की सुखद यात्रा को , बनाओ अपनी पगडंडी और चुनो अपनी एक नयी मंज़िल. जरूरी तो नहीं सही हो हर भीड़...
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Thursday, June 04, 2015
भटकते शब्द
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मन से मन का संवाद कुंवारी साँसों का स्पंदन , विस्तार स्वप्नों का आँखों से आँखों तक , अनछुए स्पर्श की सनसनाहट रग रग में , अंत...
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Saturday, May 16, 2015
साथ आंसुओं का
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हर वक़्त है तुम्हारा , बहने लगते अनवरत निभाते हैं साथ दुखों के पल में , नहीं जाते दूर छलक जाते हैं खुशियों के ...
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