Sunday, September 26, 2010

बेटी

क्यों बेटा वारिस कहलाता, बेटी सिर्फ पराया धन,
किसने देखा है, इनके अंतर्मन का अपनापन।

क्यों होता है इतना अंतर, इनके लालन पालन में,
क्यों हरदम हर ख़ुशी डालते, बेटे के ही आँचल में।

भूल एक सी दोनों की, पर निर्णय कितना अलग अलग था,
शायद तुम यह समझ न पायीं, यह मेरे अंतर का डर था।

एक प्यार है केवल सतही, छुपा दूसरा गहरे मन में,
आधारित है एक स्वार्थ पर,दूजा अंकित निर्मल मन में।

प्यार देखना चाहो तो, तुम झांको बेटी के नयनों में,
ख़ुशी ढूँढना चाहो तो, तुम ढूँढो उसकी मुस्कानों में।

कितना निर्मम नियम, जो दिल के पास वह तुम से दूर रहेगा,
जो है दिल से दूर बहुत, नज़र दुनियां की में वह वारिस होगा.

19 comments:

  1. बहुत अच्छी बात कही आपने। काश सभी इस बात को समझते। लेकिन बेटी को पराया धन कहकर , लोग उसके दुःख-दर्द भी पराये समझ लेते हैं।

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  2. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (27/9/2010) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा।
    http://charchamanch.blogspot.com

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  3. एक एक शब्द सच है...काश सब ऐसा ही सोचे और बेटियों के साथ अच्छा व्यवहार करें.

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  4. प्यार देखना चाहो तो, तुम झांको बेटी के नयनों में,
    ख़ुशी ढूँढना चाहो तो, तुम ढूँढो उसकी मुस्कानों में।
    वाकई खुशी देती हैं बेटियाँ .....

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  5. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति ..बेटियां घर कीरौनक होती हैं ..

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  6. batiyan bhi apane liye sare haq le kar aati hai,ye hamari krupanta hai ki ham use nahi dete...

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  7. सुन्दर अभिव्यक्ति

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  8. @Dr.Divya ji. Vandna ji, Shaw ji, Anamika ji, Verma ji, Sangeeta ji, Kavita ji aur Arun ji..
    aapki pratikriyaon aur protsahan ke liye dhanyavad..Regards...

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  9. प्यार देखना चाहो तो, तुम झांको बेटी के नयनों में,
    ख़ुशी ढूँढना चाहो तो, तुम ढूँढो उसकी मुस्कानों में।
    Bahut hi sundar aur khoobasurat rachana---utanee hi jitanee ki betiyon ki muskan hoti hai.shubhkamnayen.
    Poonam

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  10. mann ko choo lene wali kavita hai .....

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  11. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति ..बेटियां घर कीरौनक होती हैं ..

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  12. आपका ब्लॉग पसंद आया....इस उम्मीद में की आगे भी ऐसे ही रचनाये पड़ने को मिलेंगी......आपको फॉलो कर रहा हूँ |

    कभी फुर्सत मिले तो नाचीज़ की दहलीज़ पर भी आयें-
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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  13. क्यों बेटा वारिस कहलाता, बेटी सिर्फ पराया धन ??????

    काश सब ऐसा ही सोचे और बेटियों के साथ अच्छा व्यवहार करें.

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  14. kYon ? Kyo? Kyon ? ....ye to abhi bhi wahin hai

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  15. सही कह रहीं हैं प्रिया जी .मैं भी इस प्रश्न का उत्तर ढूंढ रहा हूँ. प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद..आभार

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  16. कल 01/11/2011को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  17. आज पुन: पढ़ी यह रचना .. हर पंक्ति दिल से हो कर गुज़री ..

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  18. bahut acchhi rachna hai Uncle ji...
    par mujhe fir wahi objection hai, ya shayad hamari parwarish us tarah se nahi hui ki hame ye fark pata chale...
    khair... jo mera problem hai wo ye, ki log ab badal rahe hain, soch badal rahi hai... thoda waqt lagega, par sab theek ho jayega... aur aisi rachnayen jinme itna zyada pyaar hota hai, itni zyada chinta hoti hai betiyon ke liye... itn akabhi ladko ko milta hai kya??? nahi na... to bas... :)
    aap sab bahut acchhe hain jo betiyon ke baare mei itna sochte hain...

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