Saturday, May 07, 2011

अज़नबी गली

हुआ था एक अजीब अहसास 
अज़नबीपन का
उस गली में,
गुजारे थे जहाँ 
जीवन के प्रारम्भ के
दो दशक.

गली के कोंने पर
दुकान वही थी,
पर चेहरा नया था
जिसमें था 
एक अनजानापन.

वह मकान भी वहीं था
और वह खिड़की भी,
पर नहीं थीं वह नज़रें
जो झांकती थीं
पर्दे के पीछे से,
जब भी उधर से गुज़रता था.

नहीं  उठायी नज़र
गली में खेलते 
किसी बच्चे ने,
नहीं दी आवाज़ 
किसी खुले दरवाज़े ने.

घर का दरवाज़ा 
जहां बीता था बचपन
खड़ा था उसी तरह
पर ताक रहा था मुझको
सूनी नज़रों से.
तलाश रही थी आँखें
इंतजार में सीढ़ियों पर बैठी बहन
और दरवाज़े पर खड़ी माँ को,
लेकिन वहां था 
सिर्फ एक सूनापन.

पुराना कलेंडर 
और कॉलेज की ग्रुप फोटो
अभी भी थे दीवार पर,
लेकिन समय की धूल ने
कर दिया था 
उनको धुंधला.
छूने से 
दीवारों पर चढ़ी धूल,
उतरने लगी 
यादों की परत दर परत,
कितने हो गए हैं दूर 
हम अपने ही अतीत से.

रसोई में
टूटे चूल्हे की ईटें देख कर
बहुत कुछ टूट गया
अन्दर से.
कहाँ है वह माँ
जो खिलाती चूल्हे पर सिकी
गर्म गर्म रोटी,
और कभी सब्जी 
इतनी स्वादिष्ट होती
कि शायद ही बच पाती,
और माँ 
आँखों में गहन संतुष्टि लिये
बची हुयी रोटी
अचार से खा लेती.

अपने अपने सपनों को 
पूरे करने की चाह में,
भूल गये उन सपनों को
जो कभी माँ ने देखे थे,
और वे चली गयीं
दुनियां से,
उदास आँखों से 
ताकते
सूने घर को.

षड़यंत्रों और लालच की आंधी ने 
बिखरा दिया उस आशियाँ को
और टूट गयी वह माँ
और उसके वह सपने.
आज मैं खड़ा हूँ उस ज़मीन पर
जिस पर मेरा कोई अधिकार नहीं,
पर नहीं छीन सकता कोई
उन यादों की धूल को
जो बिखरी है 
मेरे चारों ओर.

माँ की याद 
और आशीर्वाद का साया
अब भी है मेरे साथ.
नहीं है कोई अर्थ
आने का फिर इस गली में
अज़नबी बनने को.

45 comments:

  1. नहीं छीन सकता कोई
    उन यादों की धूल को
    जो बिखरी है
    मेरे चारों ओर
    बहुत अच्छी मर्मस्पर्शी रचना ...

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  2. माँ की याद
    और आशीर्वाद का साया
    अब भी है मेरे साथ.

    भावमय करते शब्‍द ...बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

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  3. आज नहीं उठते हैं सर किसी की चीखों पर,
    हमने फुसफुसाहट पर बवाल मचते देखा है।

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  4. बेहद भावमयी रचना ……………संवेदनायें मन को छू गयीं।

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  5. बहुत सुन्दर भावपूर्ण अभिव्यक्ति.सच है वक़्त की आंधी सब कुछ उडा ले जाती है और हम अजनबी बन ठगे से रह जाते हैं.परन्तु ,माँ का आशीर्वाद ही सच्ची सांत्वना है और आपका यह कहना ही सार्थक लगता है कि
    माँ की याद
    और आशीर्वाद का साया
    अब भी है मेरे साथ.
    नहीं है कोई अर्थ
    आने का फिर इस गली में
    अज़नबी बनने को.

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  6. और कभी सब्जी
    इतनी स्वादिष्ट होती
    कि शायद ही बच पाती,
    और माँ
    आँखों में गहन संतुष्टि लिये
    बची हुयी रोटी
    अचार से खा लेती.

    यह अभिव्यक्ति सबके बस की बात नहीं ....शुभकामनायें !!

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  7. उतरने लगी
    यादों की परत दर परत,
    कितने हो गए हैं दूर
    हम अपने ही अतीत से

    बीता वक़्त कहीं न कहीं हमें याद आता ही रहता है.लेकिन जब भी याद आता है हम उसमे कहीं खो से जाते हैं और यादों की इस दुनिया से बाहर आने का मन ही नहीं करता.

    मदर्स डे पर बहुत ही अच्छी कविता.

    सादर

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  8. घर का दरवाज़ा
    जहां बीता था बचपन
    खड़ा था उसी तरह
    पर ताक रहा था मुझको
    सूनी नज़रों से.
    तलाश रही थी आँखें
    इंतजार में सीढ़ियों पर बैठी बहन
    और दरवाज़े पर खड़ी माँ को,
    लेकिन वहां था
    सिर्फ एक सूनापन.
    aise me kahan rahta hai kuch apna , khud bhi kho jata hai insaan

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  9. नहीं छीन सकता कोई उन यादों की धूल को ..
    माँ को छीन सकते हैं , माँ की चीजों को मगर उसके प्रति हमारे प्रेम को नहीं ...
    बहुत हैरान होती हूँ,किस तरह माँ बाप धन दौलत से भी बढ़कर हो जाते हैं , मगर आस -पास लगभग हर दूसरे घर में यही माहौल दिखता है, आप जैसे मुट्ठी भर लोंग इन भावनाओं को बचाए हैं , तसल्ली है !
    मार्मिक प्रस्तुति !

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  10. माँ की याद
    और आशीर्वाद का साया
    अब भी है मेरे साथ.
    नहीं है कोई अर्थ
    आने का फिर इस गली में
    अज़नबी बनने को.
    यही सच्चाई है, सब कुछ अजनबी, पराया हो जाता है पर माँ की याद और आशीर्वाद हमेशा साथ होते हैं... अपनी सी लगती रचना...

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  11. कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन
    बीते हुए दिन वे प्यारे प्यारे पल छिन ।

    बहुत खूबसूरत कविता,एहसासों का आभास सी कराती हुई ।

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  12. bachpan ki yaad taza kara dee....

    jai baba banaras................

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  13. मन भीग गया न जाने क्यों ...शायद आपने माँ को इतनी शिद्दत से याद किया इसलिए ..

    बहुत अच्छी रचना

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  14. तलाश रही थी आँखें
    इंतजार में सीढ़ियों पर बैठी बहन
    और दरवाज़े पर खड़ी माँ को,
    लेकिन वहां था
    सिर्फ एक सूनापन.
    बहुत मार्मिक प्रस्तुति !.शुभकामनायें !!

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  15. अपने अपने सपनों को
    पूरे करने की चाह में,
    भूल गये उन सपनों को
    जो कभी माँ ने देखे थे,
    और वे चली गयीं
    दुनियां से,
    उदास आँखों से
    ताकते
    सूने घर को.
    Aankhen nam ho gayeen!

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  16. बचपन की पुरानी यादों को समेटे मन को छूनेवाली रचना !

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  17. बहुत ही मार्मिक‍ और दिल को छूनेवाली रचना, बधाई।

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  18. कहाँ है वह माँ
    जो खिलाती चूल्हे पर सिकी
    गर्म गर्म रोटी,
    और कभी सब्जी
    इतनी स्वादिष्ट होती
    कि शायद ही बच पाती,
    और माँ
    आँखों में गहन संतुष्टि लिये
    बची हुयी रोटी
    अचार से खा लेती.

    Very nice expressions of an enlightened heart.

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  19. बहुत अच्छी मर्मस्पर्शी रचना|धन्यवाद|

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  20. 'माँ की याद

    और आशीर्वाद का साया

    अब भी है मेरे साथ ....'

    ******************

    शर्मा जी ,

    क्या कहूँ ? रुला दिया आपकी रचना ने |

    यही है.......... कविता !

    प्रणम्य है आपकी लेखनी....

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  21. एकदम से भावुक कर देने वाली रचना।

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  22. बहुत सुन्दर भावपूर्ण अभिव्यक्ति
    मदर्स डे पर बहुत ही अच्छी कविता

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  23. आज मैं खड़ा हूँ उस ज़मीन पर
    जिस पर मेरा कोई अधिकार नहीं,
    पर नहीं छीन सकता कोई
    उन यादों की धूल को
    जो बिखरी है
    मेरे चारों ओर।

    यादों की यही धूल एक दिन अनमोल संपत्ति बन जाती है।
    भाव विह्वल कर देने वाली कविता।

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  24. वाह। बहुत ही भावपुर्ण शब्दों से आपने अपने दिल की बात कही है। अति सुन्दर ।

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  25. बहुत गहरे जख्म दिखाई दे रहे हैं ..कविता बहुत सुंदर है. बधाई

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  26. माँ की याद
    और आशीर्वाद का साया
    अब भी है मेरे साथ.
    नहीं है कोई अर्थ
    आने का फिर इस गली में
    अज़नबी बनने को

    बहुत ही सुंदर भावपूर्ण रचना ........पुरानी यादों में ममता के कितने रंग सिमट आये....... उत्कृष्ट रचना

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  27. गजब जनाब...क्या कहें...

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  28. माँ की याद
    और आशीर्वाद का साया
    अब भी है मेरे साथ.
    नहीं है कोई अर्थ
    आने का फिर इस गली में
    अज़नबी बनने को
    ......बहुत सुन्दर कविता।

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  29. marm ko samjhane wali ma ....shayad koyi upama nahin ,usake samtuly----

    अपने अपने सपनों को
    पूरे करने की चाह में,
    भूल गये उन सपनों को
    जो कभी माँ ने देखे थे,
    sifat aap ki maa ki sifat men . ati sunser .

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  30. माँ की याद
    और आशीर्वाद का साया
    अब भी है मेरे साथ.
    नहीं है कोई अर्थ
    आने का फिर इस गली में
    बहुतसुन्दर भावों के साथ माँ की याद को सजाया है । मातृ दिवस की बधाई । धन्यवाद ।

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  31. संवेदनशील और बेहतरीन रचना! पढ़कर अतीत में खो सा गया!

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  32. बचपन की बात ही निराली है जिसे हम कभी भूल नही सकते है..बहुत बढ़िया रचना प्रस्तुत की आपने..बधाई

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  33. माँ की याद
    और आशीर्वाद का साया
    अब भी है मेरे साथ.
    नहीं है कोई अर्थ
    आने का फिर इस गली में
    अज़नबी बनने को.

    बचपन कि यादें और माँ का सरमाया. गज़ब कि रचना रची है दिलको छू लेने वाली सुंदर कविता.

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  34. नि:शब्द करते एहसास ......बहुत-बहुत अच्छी अनुभूति.....सादर !

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  35. गुज़रा हुवा वक़्त कितना कुछ तोड़ जाता है कभी कभी ... इंसान के सपने भी तो पागल होते हैं ...

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  36. गुजरा हुआ समय लौट कर नहीं आता |बस यादे ही रह जाती हैं |बहुत अच्छी प्रस्तुति |
    आशा

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  37. बहुत गहन भावार्थ लिए कविता बधाई सर

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  38. खुद भूखी रह कर भी बच्चे के पेट भर खा लेने से संतुष्ट हो पाने की शक्ति सिर्फ माँ के ही पास होती है और माँ के ही हाथो मे वो जादू होता है जो ५६ भोग भी उस पीली दाल के सामने बेस्वाद ही लगते हैं

    मै क्या तारीफ करूँ उसके लिए जो सामर्थ्य चाहिए वो मुझ मे नहीं है सिर्फ यही कह सकता हूँ

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  39. बहुत सच्ची बातें कहीं हैं

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  40. बहुत सुन्दर भाव और अभिव्यक्ति के साथ लाजवाब रचना लिखा है आपने जो काबिले तारीफ़ है! बधाई!

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  41. माँ की याद
    और आशीर्वाद का साया
    अब भी है मेरे साथ.
    behad khubsurat aur marmik prashang liya hai aap ne , aabhar

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  42. एकदम से भावुक कर देने वाली रचना। मार्मिक चित्रण!

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