Friday, August 16, 2013

आँख में फ़िर से नमी छाई है

आज़ फ़िर काली घटा छाई है,
आँख में फ़िर से नमी छाई है.

है नहीं कोई सुने आवाज़ मेरी,
सिर्फ़ मैं और मेरी तनहाई है.

चलते रहे बोझ उठाए सर पर,
धूप में न छांव नज़र आई है.

सर्द अहसास हुए इस हद तक,
खून में घुल गयी सियाही है. 

अब न ज़लते चराग उमीदों के,
ज़ब से आंधी फ़लक पे छाई है.

आज फ़िर खुल के बहेंगे आंसू,
साथ देने बरसात चली आई है.

...कैलाश शर्मा 


48 comments:

  1. बहुत भावपूर्ण प्रस्तुति , मन छू गयी .

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  2. वाह। जीवन में फैले दु:खों का कितना बढ़िया शब्‍दांकन किया है।

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  3. आज फ़िर खुल के बहेंगे आंसू,
    साथ देने बरसात चली आई है.
    ***
    जैसे मेरे ही भाव लिख गयी आपकी कलम!

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  4. बहुत सुंदर गज़ल ! हर शेर मन को भाव विभोर करने में सक्षम है ! बहुत खूब !

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  5. khubsurat ... ek ek panktiyan ehsaso me piroyi huyi dil ko chhu gayi .. :)

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  6. बहुत सुंदर गज़ल कैलाश जी।

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  7. शेर मन को भाव विभोर करने में सक्षम है
    बहुत सुंदर गज़ल !!

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  8. har sher lajwaab hai bahut sundar gajal likhi hai aapne

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  9. सुंदर प्रस्तुति कैलाश जी।।।

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  10. लगी आज सावन की फिर वो झड़ी है,
    वही आग सीने में फिर जल पड़ी है...सुंदर भावभिव्यक्ति।

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  11. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी का लिंक कल शनिवार (17-08-2013) को "राम राज्य स्थापित हो पाएगा" (शनिवारीय चर्चा मंच-अंकः1339) पर भी होगा!
    स्वतन्त्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  12. चलते रहे बोझ उठाए सर पर,
    धूप में न छांव नज़र आई है...बहुत सुन्दर ..

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  13. प्रभावी अभिव्यक्ति...बधाई...

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  14. अब न ज़लते चराग उमीदों के,
    ज़ब से आंधी फ़लक पे छाई है.

    वाऽहऽऽ…!

    आदरणीय कैलाश जी भाईसा'ब
    सुंदर भावप्रवण रचना के लिए साधुवाद !

    सादर बधाई और शुभकामनाएं !
    -राजेन्द्र स्वर्णकार

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  15. भावपूर्ण गजल के लिए बधाई स्वीकारें कैलाश जी ,,,
    स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाए,,,
    RECENT POST: आज़ादी की वर्षगांठ.

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  16. बेहद खूबसूरत रचना …. आभार

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  17. बहुत खुबसूरत रचना !!!

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  18. vaah bahut khub...behad achi gazal hui hai......bahut khub

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  19. चलते रहे बोझ उठाए सर पर,
    धूप में न छांव नज़र आई है.

    सर्द अहसास हुए इस हद तक,
    खून में घुल गयी सियाही है.

    bahut badhiya

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  20. बहुत खुबसूरत ,भावपूर्ण ज़ज़्बात!
    मुबारक कबूलें भाई जी ...

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  21. बहुतत सुन्दर भाव पिरोये हैं।

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  22. बहुत सुंदर भावपूर्ण अहसास पिरोये हैं।
    आभार आदरणीय कैलाश जी

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  23. आज फ़िर खुल के बहेंगे आंसू,
    साथ देने बरसात चली आई है.

    ज़बरदस्त शे'र बना है. सुन्दर ग़ज़ल.

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  24. wah ! bhavpurn rachna....dil ko chuti hui

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  25. आज फ़िर खुल के बहेंगे आंसू,
    साथ देने बरसात चली आई है.

    Waah! Waah! Waah!
    Behtareen....

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  26. वाह बहुत खूब… दाद कबूल करें

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  27. bahut khoob kailash ji

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  28. अक्सर यादों की बारिश आँखों में आंसू ले ही आती है
    बहुत सुन्दर

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  29. वाह बहुत खूब !,बहुत सुन्दर .

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  30. बेहद खुबसूरत रचना....
    लाजवाब....
    :-)

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  31. बहुत सुन्दर ग़ज़ल

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  32. आज फ़िर खुल के बहेंगे आंसू,
    साथ देने बरसात चली आई है ।

    आह , दर्द भरी गज़ल

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  33. चलते रहे बोझ उठाए सर पर,
    धूप में न छांव नज़र आई है...

    जिंदगी की धूप में ये जीवन का बोझ उठाए अकेले ही चलना होता है ...
    लाजवाब गज़ल है ...

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  34. संवेदना युक्त प्रस्तुति......
    आज फ़िर खुल के बहेंगे आंसू,
    साथ देने बरसात चली आई है..
    ....
    सुन्दर भाव और शब्द संयोजन..

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  35. आज फ़िर खुल के बहेंगे आंसू,
    साथ देने बरसात चली आई है.
    BEAUTIFUL LINES WITH GREAT EXPRESSION

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  36. खूबसूरत गज़ल..वाह!

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  37. waah sir, kya jabardast likhe hain sir.,.,bahot sundar bhav

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  38. कैलाश जी ,
    मैंने कई बार इसे पढ़ा. मन में कही जाकर बस गयी इसकी हर पंक्ति ... हर शब्द जाने कुछ कहता है ..

    दिल से बधाई स्वीकार करे.

    विजय कुमार
    मेरे कहानी का ब्लॉग है : storiesbyvijay.blogspot.com

    मेरी कविताओ का ब्लॉग है : poemsofvijay.blogspot.com

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  39. ati uttam...........gazal...

    plz visit here...

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