Thursday, June 29, 2017

पतझड़

हरे थे जब पात
अपनों का था साथ
गूँजते थे स्वर 
टहनियों पर बने घोंसलों से।


रह गया जब ठूंठ
अपने गये छूट
सपने गये रूठ,
कितना अपना सा लगता
एक पल का साथी भी
जीवन के सूनेपन में।

...©कैलाश शर्मा

27 comments:

  1. आदरनीय कैलाश शर्मान जी ,खूबसूरत यथार्थ पर आधारित सुंदर रचना

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  2. प्रकृति, प्रेम, परिवार...सहसम्बंधों को उजागर करती रचना...अहा.🐥🐦

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  3. घनेरी छाँव सबको भाती है, वक़्त-वक़्त की बात होती है
    बहुत सही लिखा है

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  4. सटीक अभिव्यक्ति..
    बहुत बढिया..

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  5. जीवन का सत्य है ये ... बिछड़े सभी बारी बारी ...
    पंची भी छोड़ जाते हैं ठूंठ का साथ ...

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  6. समय का खेल सब ...हृदयस्पर्शी

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  7. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा आज शनिवार (01-07-2017) को
    "विशेष चर्चा "चिट्टाकारी दिवस बनाम ब्लॉगिंग-डे"
    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  8. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" रविवार 02 जुलाई 2017 को लिंक की गई है.................. http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  9. एक वक़्त आता है, जब सब झूठ लगने लगता है, शायद विरक्ति के लिए यह लग्न सही है
    , सारे मोहबंध खुल जाते हैं ...

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  10. कम शब्दों में कभी-कभी बहुत सी बातें कह दी जातीं हैं... आपकी ये छोटी सी कविता भी मुझे वैसी ही लगी...

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  11. हरे थे जब पात.
    सबका था तब साथ...
    वाह!!!
    पात सूखे साथ छूटे...
    वृद्धावस्था है ठूठ सी...
    सुन्दर प
    रतीकात्मक रचना....

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  12. यही जीवन की रीत है

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  13. समय के स्वाभाव को सरलता के साथ अभिव्यक्ति दी है आपने। सीधे दिल में उतरते शब्द। शानदार रचना।

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  14. बहुत सुंदर प्रस्तुति आदरणीय । बहुत खूब ।

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  15. बेहद गहन भाव ...

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  16. एकाकीभाव ही चरम सत्य है शायद ! अन्य सभी भाव आते जाते रहते हैं... सादर ।

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  17. बिल्कुल सही कहा

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  18. यथार्थ की संवेदनशील प्रस्तुति ।
    मर्मस्पर्शी...

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  19. अंतिम सत्य कहा है ।

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  20. अगर मैं गलत नहीं हूँ तो आप पतझड़ के माध्यम से इंसान की जिंदगी के विभिन्न आयामों को छूना चाह रहे हैं , जिंदगी को सम्बंधित करना चाह रहे हैं और बखूबी कर रहे हैं !! शानदार और अनूठी कृति है आदरणीय शर्मा जी !!

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  21. जीवन के पतझर में कोई साथ नही होता. यही जीवन और यही सत्य. भावप्रवण रचना के लिए बधाई.

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  22. बहुत सुन्दर कविता है सर.

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