Friday, October 14, 2011

मीरा तो बन सकती हूँ

अगर नहीं बन पायी राधा, 
मीरा  तो  बन  सकती  हूँ.
मुरली बन न अधर छू सकी, 
मुरली  तो सुन सकती हूँ.

     नहीं ज़रूरी है जीवन में, 
साथ मिले प्रियतम का हर पल.
     मेरे लिये बहुत है इतना, 
हर श्वासों  में हो तेरी  हल चल.

प्रेम न तन का साथ मांगता, 
वह तो  रोम  रोम  बसता  है.
नयन उठाकर जिधर मैं देखूं, 
कण कण में तू ही दिखता है.

श्याममयी हो गया है जीवन, 
ईर्ष्या फिर राधा से क्यों हो?
चरण धूल सिंदूर बन गया,  
इससे बढ़ आशा फिर क्यों हो?

52 comments:

  1. प्रेम न तन का साथ मांगता,
    वह तो रोम रोम बसता है.
    नयन उठाकर जिधर मैं देखूं,
    कण कण में तू ही दिखता है.

    बहुत ख़ूबसूरत जज्बातों से सजी पोस्ट.....शानदार|

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  2. श्याममयी हो गया है जीवन,
    ईर्ष्या फिर राधा से क्यों हो?

    बहुत बढ़िया |
    बधाई ||
    http://dineshkidillagi.blogspot.com/

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  3. प्रेम न तन का साथ मांगता,
    वह तो रोम रोम बसता है.
    नयन उठाकर जिधर मैं देखूं,
    कण कण में तू ही दिखता है.
    --
    बहुत सुन्दर कविता रची है आपने!

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  4. श्याममयी हो गया है जीवन,
    ईर्ष्या फिर राधा से क्यों हो?
    चरण धूल सिंदूर बन गया,
    इससे बढ़ आशा फिर क्यों हो?

    इसके बाद कहने को क्या बचा…………बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

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  5. श्याममयी हो गया है जीवन....बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

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  6. पवित्रता से भरी अतिसुन्दर रचना के लिए बहुत-बहुत बधाई.

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  7. बहुत ही खूबसूरत कविता है सर!

    सादर

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  8. सुन्दर रचना

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  9. कुछ न कुछ तो हो प्रियतम का,
    प्राप्ति वही, सन्तोष वही..

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  10. श्याममयी हो गया है जीवन,
    ईर्ष्या फिर राधा से क्यों हो?
    बहुत ही खूबसूरत रचना सर

    सादर....

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  11. नहीं ज़रूरी है जीवन में,
    साथ मिले प्रियतम का हर
    मेरे लिये बहुत है इतना,
    हर श्वासों में हो तेरी हल चल...bhaut hi umda....

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  12. अगर नहीं बन पायी राधा,
    मीरा तो बन सकती हूँ.
    मुरली बन न अधर छू सकी,
    मुरली तो सुन सकती हूँ.
    maja aa gaya sir bahut khub likha hai
    jai hind jai bharat

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  13. नहीं ज़रूरी है जीवन में,
    साथ मिले प्रियतम का हर पल.
    मेरे लिये बहुत है इतना,
    हर श्वासों में हो तेरी हल चल.

    चंद लाइन में आपने बहुत गहरी बात कहा है बधाई हो आपको आप भी आये मेरे ब्लाग पर और जरुर शामिल हो ब्लाग और फेसबुक दोनों में
    लिंक नीचे है

    MADHUR VAANI

    MITRA-MADHUR

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  14. बहुत सुन्दर प्रस्तुति, आभार .

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  15. बहुत सुन्दर प्रस्तुति, आभार

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  16. आपकी प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

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  17. चरण धूल सिंदूर बन गया,
    इससे बढ़ आशा फिर क्यों हो?

    Gahan...Bahut Sunder Rchana...

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  18. सुन्दर भावप्रवण रचना , कैलाश जी की पोटली से बेहतरीन काव्य बधाई

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  19. गहरे भाव।
    सुंदर प्रस्‍तुति।

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  20. prem ka sachha chitran
    bahut sunder :)

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  21. श्याममयी हो गया है जीवन,
    ईर्ष्या फिर राधा से क्यों हो?
    चरण धूल सिंदूर बन गया,
    इससे बढ़ आशा फिर क्यों हो?

    पवित्र प्रेम और समर्पण के अद्भुत भाव...

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  22. शर्मा जी आप की प्रस्तुतियों में अद्भुत प्रवाह के साथ साथ भावों का भी बहुत ही सुंदर चित्रण होता है। बधाई।

    गुजर गया एक साल

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  23. BEAUTIFUL !!!!!
    absolutely lovely poem - thanks :)

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  24. प्रेम न तन का साथ मांगता,
    वह तो रोम रोम बसता है.
    नयन उठाकर जिधर मैं देखूं,
    कण कण में तू ही दिखता है.
    वाह ...बहुत बढि़या ।

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  25. प्रेम न तन का साथ मांगता,
    वह तो रोम रोम बसता है.
    नयन उठाकर जिधर मैं देखूं,
    कण कण में तू ही दिखता है.
    बहुत सुंदर और अनुकरणीय विचार।

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  26. प्रेम की पराकाष्ठा को दर्शाती हुई सुंदर कविता...

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  27. सुन्‍दर अभिव्‍यक्ति.

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  28. बहुत सुंदर कविता .

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  29. yet again... a fantastic read :)
    specially liked the last verse

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  30. श्याममयी हो गया है जीवन,
    ईर्ष्या फिर राधा से क्यों हो?
    चरण धूल सिंदूर बन गया,
    इससे बढ़ आशा फिर क्यों हो?..madhusudan ke charno ki raj mil jaaye is se badi aasha honi bhi nahi chahiye...behtarin rachna,,,sadar badhayee aaur amantran ke sath

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  31. श्याममयी हो गया है जीवन,
    ईर्ष्या फिर राधा से क्यों हो?

    प्रेम की पूर्णता होने पर किसी भी तरह के आग्रह व बंधन बेमानी हो जाते हैं।बहुत सुंदर व आध्यात्मिक संतुष्टि देती प्रस्तुति।

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  32. भावना और कविता, दोनों ही लाजवाब!

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  33. यही समर्पण तो ‘उससे’ मिलने की राह दिखाता है।

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  34. श्याममयी हो गया है जीवन,
    ईर्ष्या फिर राधा से क्यों हो?
    चरण धूल सिंदूर बन गया,
    इससे बढ़ आशा फिर क्यों हो?

    एक बार जब श्याममय हो ही गए फिर संशय का स्थान कहा.

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  35. नहीं जरूरी है जीवन में,
    साथ मिले प्रियतम का हर पल.
    मेरे लिये बहुत है इतना,
    हर श्वासों में हो तेरी हल चल.

    इस सुंदर गीत के लिए आभार।

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  36. मुरली बन न अधर छू सकी,
    मुरली तो सुन सकती हूँ.
    सुंदर!

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  37. श्रद्धा भक्ति और समर्पण भाव से ओतप्रोत रचना ...

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  38. कृष्‍णमयी रचना के लिये धन्‍यवाद.

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  39. बहुत सुन्दर....

    अगर नहीं बन पायी राधा,
    मीरा तो बन सकती हूँ.

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  40. आपकी पोस्ट को आज ब्लोगर्स मीट वीकली(१३)के मंच पर प्रस्तुत की गई है आप आइये और अपने विचारों से हमें अवगत करिए /आप हिंदी की सेवा इसी मेहनत और लगन से करते रहें यही कामना है /आपका
    ब्लोगर्स मीट वीकली के मंच पर आपका स्वागत है /जरुर पधारें/आभार /

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  41. बहुत सुन्दर और भावपूर्ण रचना! लाजवाब प्रस्तुती !

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  42. बहुत सुन्दर! लाजवाब प्रस्तुती !

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  43. समर्पित प्रेम का ये भाव कमाल है ... जो मिले बहुत है ... सुन्दर भावपूर्ण रचना ...

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  44. बहुत सुंदर मीरा के प्रेम की तरह ।

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  45. प्रेम न तन का साथ मांगता,
    वह तो रोम रोम बसता है.
    नयन उठाकर जिधर मैं देखूं,
    कण कण में तू ही दिखता है.
    bhut khub.

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  46. वाह! अनुपम,शानदार.
    भक्तिमय कर दिया है आपने.
    आभार.

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