Saturday, September 21, 2019

चादर सन्नाटे की


चारों ओर पसरा है सन्नाटा
मौन है श्वासों का शोर भी,
उघाड़ कर चाहता फेंक देना
चीख कर चादर मौन की,
लेकिन अंतस का सूनापन
खींच कर फिर से ओढ़ लेता 
चादर सन्नाटे की।

पास आने से झिझकता
सागर की लहरों का शोर,
मौन होकर गुज़र जाता दरवाज़े से 
दबे क़दमों से भीड़ का कोलाहल
अनकहे शब्दों का क्रंदन
आकुल है अभिव्यक्त होने को,
क्यूँ आज तक हैं चुभतीं 
टूटे ख़्वाब की किरचें अंतस में।

थप थपा कर देखो कभी मौन का दरवाज़ा भी
दहल जाएगा अंतस सुन कर शोर सन्नाटे का।

...©कैलाश शर्मा

16 comments:

  1. बेहद हृदयस्पर्शी सृजन सर।

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  2. वाह बेहतरीन रचनाओं का संगम।एक से बढ़कर एक प्रस्तुति।
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  3. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (23-09-2019) को    "आलस में सब चूर"   (चर्चा अंक- 3467)   पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  4. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज रविवार 22 सितंबर 2019 को साझा की गई है......... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  5. बेहतरीन रचना

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  6. बहुत ही सुन्दर सृजन आदरणीय
    सादर

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  7. भावपूर्ण रचना..

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  8. क्यूँ आज तक हैं चुभतीं
    टूटे ख़्वाब की किरचें अंतस में।... बहुत मुश्क‍िल होता है ये समझना और फ‍िर स्वयं को ढांढस बंधाना ... बेहद खूबसूरत रचना कैलाश जी

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  9. इस सन्नाटे का भी शोर भी कई बात कानों के परदे फाड़ देता है ...
    बहुत ही लाजवाब भावपूर्ण रचना ...

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  10. बहुत सुंदर मृम स्पृशी अभिव्यक्ति ।
    अनुपम।

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  11. लाजवाब प्रस्तुति। बहुत उम्दा लिखा है।

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  14. आपके सन्नाटे को शोर मेरे कान के परदे चीर रही हैं । शानदार लेखन हेतु साधुवाद आदरणीय ।

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