कैसे देखूं मैं अब सपने,
इन आँखों में अश्रु भरे हैं,
नींद खडी है दरवाज़े पर,
हर कोने में दर्द खड़े हैं।
रातों का हर पहर डराता
तिमिर ढांक अंतस को जाता,
रात अमावस की काली में
कोई अस्तित्व नज़र न आता,
कैसे हाथ बढ़ा कर पकडूँ
सौगंधों के शूल गढ़े हैं।
इन आँखों में अश्रु भरे हैं,
नींद खडी है दरवाज़े पर,
हर कोने में दर्द खड़े हैं।
रातों का हर पहर डराता
तिमिर ढांक अंतस को जाता,
रात अमावस की काली में
कोई अस्तित्व नज़र न आता,
कैसे हाथ बढ़ा कर पकडूँ
सौगंधों के शूल गढ़े हैं।
धूमिल हुई हाथ की मेहंदी
सजल नयन
सूखे सूखे से,
भीगे भीगे भाव हैं मन के
तृषित अधर रूखे रूखे से,
नज़र चाँद की आज न उठती
तारे पहरेदार खड़े हैं।
भीगे भीगे भाव हैं मन के
तृषित अधर रूखे रूखे से,
नज़र चाँद की आज न उठती
तारे पहरेदार खड़े हैं।
बोझ है मन पर कितना भारी
जीवन हुआ सिर्फ लाचारी,
वर्षा ऋतु में मन बगिया की
पतझड़ झेल रही हर क्यारी,
खुशियाँ मौन खड़ी हैं दर पर
सन्नाटे की चीख ड़से है.
...कैलाश शर्मा
