Monday, February 27, 2017

कैसी यह मनहूस डगर है

भूल गयी गौरैया आँगन,
मूक हुए हैं कोयल के स्वर,
ठूठ हुआ आँगन का बरगद,
नहीं बनाता अब कोई घर।

लगती नहीं न अब चौपालें,
शोर नहीं बच्चों का होता।
झूलों को अब डाल तरसतीं,
सावन भी अब सूना होता।

पगडंडी सुनसान पडी है,
नहीं शहर से कोई आता।
कैसी यह मनहूस डगर है,
नहीं लौटता जो भी जाता।
  

कंकरीट के इस जंगल में,
अपनेपन की छाँव न पायी।
आँखों से कुछ अश्रु ढल गये,
आयी याद थी जब अमराई।


पंख कटे पक्षी के जैसे,
सूने नयन गगन को तकते।
ऐसे फसे जाल में सब हैं,
मुक्ति की है आस न करते।

...©कैलाश शर्मा 

26 comments:

  1. दिनांक 28/02/2017 को...
    आप की रचना का लिंक होगा...
    पांच लिंकों का आनंदhttps://www.halchalwith5links.blogspot.com पर...
    आप भी इस चर्चा में सादर आमंत्रित हैं...
    आप की प्रतीक्षा रहेगी...

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  2. खुबसूरत द्वन्द मनोभावों को प्रस्तुत करती कविता।

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  3. शहर और गाँव के जीवन के अंतर को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया है, विकास के नाम पर आज गाँव सिकुड़ते जा रहे हैं, बड़े-बड़े निर्माण कार्य हो रहे हैं, शायद नई पीढ़ी के बच्चों को अमराई और पनघट जैसे शब्दों के अर्थ शब्दकोश में ही ढूँढने पड़ेंगे. सच यही है कि समय का पहिया आगे ही आगे बढ़ता है

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  4. man ke bhaav likh diye aapne ... koi lout ke nahi ata ...

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  5. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, "मैं सजदा करता हूँ उस जगह जहाँ कोई ' शहीद ' हुआ हो ... “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  6. Bahut khoobsurati ke sath manobhavon ka chitran kiya hai aapne .

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  7. पगडंडी सुनसान पडी है,
    नहीं शहर से कोई आता।
    कैसी यह मनहूस डगर है,
    नहीं लौटता जो भी जाता।
    इस दर्द को मेरे सहित बहुतों ने झेला होगा लेकिन ..........कुछ तो मजबूरियां रही होंगी , कोई यूँ ही बेवफा नही होता

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  8. समय सब-कुछ उलट-पलट कर देता है ।
    मन पर अमिट छाप छोड़ती रचना ।

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  9. गाँव सूने सूने से हो रहे हैं।लोग शहरी हो गये है
    कितना सटीक सुन्दर शब्दचित्र।
    वाह !!

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  10. बहुत ही उम्दा

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  11. बहुत ही उम्दा

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  12. भूल गई गौरैया आंगन यह बात एक बार फिर आपने याद दिला दी। मुझे गौरैया की कमी बहुत सालती है। बहुत ही अच्छी रचना प्रस्तुत की है आपने। इसके लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद।

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  13. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (05-03-2017) को
    "खिलते हैं फूल रेगिस्तान में" (चर्चा अंक-2602)
    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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  14. सच कहूं तो यह कविता पढ़ते समय मैं एक अलग ही दुनिया में खो गया था .... शायद वो बचपन था जिसमे ये सब घटनाएं हुआ करती थीं but अब नहीं ... kitne achchhe din the wo. :)

    बहुत ही बढ़िया article है ..... ऐसे ही लिखते रहिये और मार्गदर्शन करते रहिये ..... शेयर करने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद। :) :)

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  15. बहुत सुन्दर रचना प्रस्तुति

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  16. आपकी लिखी रचना "मित्र मंडली" में लिंक की गई है http://rakeshkirachanay.blogspot.in/2017/03/9.html पर आप सादर आमंत्रित हैं ....धन्यवाद

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  17. कंकरीट के इस जंगल में,
    अपनेपन की छाँव न पायी।
    आँखों से कुछ अश्रु ढल गये,
    आयी याद थी जब अमराई।

    आज की दुनिया का सबसे भयावह और कडवा सत्य छुपा है इन पंक्तियों में | सचमुच कंक्रीट के इन घरौंदों में सर पर छत पाने का सुख तो है पर अपनी जड़ों और प्रकृति से कटने का असहनीय दर्द भी कम नहीं -- जिसे आपने बहुत ही सरल और मर्म स्पर्शी शब्दों में उकेरा है -------- -

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