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Tuesday, March 07, 2017

बेटी

आँगन है चहचहाता, जब होती बेटियां,
गुलशन है महक जाता, जब होती बेटियां।

आकर के थके मांदे, घर में क़दम रखते,
हो जाती थकन गायब, जब होती बेटियां।

रोशन है रात करतीं, जुगनू सी चमक के,
जीने की लगन देती, जब होती बेटियां।

जीवन में कुछ न चाहा, बस प्यार बांटती,
दिल में है दर्द होता, गर रोती बेटियां।

जाती हैं दूर घर से, यादें हैं छोड़ कर,
आँखों में ख़ाब बन के, बस सोती बेटियां।

...©कैलाश शर्मा 

Monday, February 27, 2017

कैसी यह मनहूस डगर है

भूल गयी गौरैया आँगन,
मूक हुए हैं कोयल के स्वर,
ठूठ हुआ आँगन का बरगद,
नहीं बनाता अब कोई घर।

लगती नहीं न अब चौपालें,
शोर नहीं बच्चों का होता।
झूलों को अब डाल तरसतीं,
सावन भी अब सूना होता।

पगडंडी सुनसान पडी है,
नहीं शहर से कोई आता।
कैसी यह मनहूस डगर है,
नहीं लौटता जो भी जाता।
  

कंकरीट के इस जंगल में,
अपनेपन की छाँव न पायी।
आँखों से कुछ अश्रु ढल गये,
आयी याद थी जब अमराई।


पंख कटे पक्षी के जैसे,
सूने नयन गगन को तकते।
ऐसे फसे जाल में सब हैं,
मुक्ति की है आस न करते।

...©कैलाश शर्मा 

Tuesday, December 09, 2014

घर

घर नहीं होता बेज़ानदार
छत से घिरी चार दीवारों का,
घर के एक एक कोने में 
छुपा इतिहास जीवन का।

खरोंचें संघर्ष की
जीवन के हर मोड़ की,
सीलन दीवारों पर 
बहे हुए अश्क़ों की,
यादें उन अपनों की 
जो रह गये बन के
एक तस्वीर दीवार की,
गूंजती खिलखिलाहट 
अब भी इस सूने घर में
भूले बिसरे रिश्तों व पल की,
साथ उन टूटे ख़्वाबों का 
जो संजोये थे कभी
बिखरे अभी भी हर कोने में।


अकेलापन तन का
पर नहीं सूनापन मन का 
इस घर की चार दीवारों में,
एक एक ईंट और गारे में
समाहित सम्पूर्ण जीवन इतिहास
देता है सुकून व संतुष्टि,
नहीं महसूस होता अकेलापन
इस सुनसान घर की 
चार दीवारों के बीच,
नहीं खलता मौन 
बातें करते यादों से 
इस जीवन संध्या में।

...कैलाश शर्मा