Saturday, November 28, 2015

क्षणिकाएं

कुछ दर्द, कुछ अश्क़,
धुआं सुलगते अरमानों का
ठंडी निश्वास धधकते अंतस की,
तेरे नाम के साथ
छत की कड़ियों की
अंत हीन गिनती,
बन कर रह गयी ज़िंदगी
एक अधूरी पेन्टिंग
एक धुंधले कैनवास पर।

*****

तोड़ने को तिलस्म मौन का
देता आवाज़ स्वयं को
अपने नाम से,
गूंजती हंसी मौन की
देखता मुझे निरीहता से
बैठ जाता फ़िर पास मेरे मौन से।

...©कैलाश शर्मा

32 comments:

  1. मौन जिंदगी का अंतहीन दर्द।

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (29-11-2015) को "मैला हुआ है आवरण" (चर्चा-अंक 2175) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. बहुत सुन्दर

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  4. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, अमर शहीद संदीप उन्नीकृष्णन का ७ वां बलिदान दिवस , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  5. बहुत सुंदर प्रस्तुती...

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  6. सुंदर प्रस्तुति, एकांत भी कभी कभी कितना भारी हो जाता है।

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  7. वाह, बहुत ही सुंदर प्रस्‍तुति।

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  8. सुंदर रचना बधाई कैलाश शर्मा जी

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  9. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" सोमवार 30 नवम्बबर 2015 को लिंक की जाएगी............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  10. बहुत ही खूबसूरत रचना।अति सुन्दर सर।

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  11. बहुत ही खूबसूरत रचना।अति सुन्दर सर।

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  12. बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति, आभार।

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  13. ये अकेलापन है जो इतनी गहन अनुभूति देता है .... मार्मिक

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  14. तोड़ने को तिलस्म मौन का
    देता आवाज़ स्वयं को
    अपने नाम से,
    गूंजती हंसी मौन की
    देखता मुझे निरीहता से
    बैठ जाता फ़िर पास मेरे मौन से ... atyant prabhavshali prastuti

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  15. वाह, बहुत सुंदर

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  16. वाह, बहुत सुंदर

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  17. तोड़ने को तिलस्म मौन का
    देता आवाज़ स्वयं को
    अपने नाम से,
    गूंजती हंसी मौन की
    देखता मुझे निरीहता से
    बैठ जाता फ़िर पास मेरे मौन से।
    बहुत सुन्दर प्रस्तुति आदरणीय शर्मा जी !

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  18. सुन्दर व सार्थक रचना प्रस्तुतिकरण के लिए आभार..
    मेरे ब्लॉग की नई पोस्ट पर आपका इंतजार....

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  19. बेहद सुंदर रचना ।

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  20. वाह.बहुत खूब,सुंदर अभिव्यक्ति,,,
    एक बार हमारे ब्लॉग पुरानीबस्ती पर भी आकर हमें कृतार्थ करें _/\_
    http://puraneebastee.blogspot.in/2015/03/pedo-ki-jaat.html

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