Saturday, December 01, 2018

क्षणिकाएं


नहीं चल पाता सत्य
आज अपने पैरों पर,
वक़्त ने कर दिया मज़बूर
पकड़ कर चलने को
उंगली असत्य की।
***

चलते नहीं साथ साथ
हमारे दो पैर भी
एक बढ़ता आगे 
दूसरा रह जाता पीछे,
क्यूँ हो फ़िर शिकायत
जब न दे कोई साथ
जीवन के सफ़र में।
***

ढूँढते प्यार हर मुमकिन कोने में
पाते हर कोना खाली
और बैठ जाते निराशा से
एक कोने में.

समय करा देता अहसास
छुपी थी खुशियाँ और प्यार
अपने ही अंतर्मन में
अनजान थे जिससे अब तक।
***

समझौता हर क़दम
अपनी खुशियों से,
कुचलना ख्वाहिशों का
जीवन के हर पल में,
क्या अर्थ ऐसे जीवन का।


समझौतों के साथ जीने से 
क्या नहीं बेहतर है
अकेलेपन का सूनापन?
***


...©कैलाश शर्मा

13 comments:

  1. दिल को छूती बहुत सुन्दर क्षणिकाएं...

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  2. एक लम्बे अंतरालके बाद? सुन्दर प्रस्तुति। आशा है सब कुशल से होंगे आदरणीय?

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    1. कुछ आलस के कारण ही ब्लॉग जगत से दूर रहा. मैं स्वस्थ हूँ. बहुत बहुत आभार

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  3. बहुत सटीक और सुन्दर क्षणिकाएं लिखी हैं आपने आदरणीय शर्मा जी ...

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  4. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (03-12-2018) को "द्वार पर किसानों की गुहार" (चर्चा अंक-3174) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    राधा तिवारी

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  5. आपकी लिखी रचना "मित्र मंडली" में लिंक की गई है. https://rakeshkirachanay.blogspot.com/2018/12/98.html पर आप सादर आमंत्रित हैं ....धन्यवाद!

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  6. उत्कृष्ट अभिव्यक्ति, सटीक संवेदनशील।

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  7. असत्य की ऊँगली छू कर चलता सत्य ...
    समझोता या अकेलेपन का सूना पन ... बहुत लाजवाब ... हर क्षणिका में छुपा सार्थक स्पष्ट सन्देश ...

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  8. बहुत सुन्दर क्षणिकाएं।

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  9. हृदयगाथा बयान करती सुंदर क्षणिकाएं

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  10. बहुत ही सुन्दर, सार्थक, लाजवाब क्षणिकाएं...

    समय करा देता अहसास
    छुपी थी खुशियाँ और प्यार
    अपने ही अंतर्मन में
    अनजान थे जिससे अब तक।

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