Wednesday, December 12, 2018

क्षणिकाएं


जियो हर पल को
एक पल की तरह
सम्पूर्ण अपने आप में,
न जुड़ा है कल से
न जुड़ेगा कल से।
***

काश होता जीवन
कैक्टस पौधे जैसा,
अप्रभावित
धूप पानी स्नेह से,
खिलता जिसका फूल
तप्त मरुथल में
दूर स्वार्थी नज़रों से|
***

दुहराता है इतिहास
केवल उनके लिए
जो रखते नज़र इतिहास पर।

जो चलते हैं साथ
पकड़ उंगली वर्त्तमान की,
उनका हर क़दम
बन जाता स्वयं इतिहास
अगली पीढी का।
***

धुंधलाती शाम
सिसकती हवा
टिमटिमाते कुछ स्वप्न
कसमसाते शब्द
सबूत हैं मेरे वज़ूद का।
***

...©कैलाश शर्मा

20 comments:

  1. वाह। सटीक क्षणिकाएं।

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  2. वर्तमान के हर पल को संजोती सुंदर क्षणिकाएं।

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  3. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (14-12-2018) को "सुख का सूरज नहीं गगन में" (चर्चा अंक-3185) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  4. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार १४ दिसंबर २०१८ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

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  5. जीवन के अनुभवों का विश्लेषण करके लिखी गई एक मार्गदर्शी रचना। बहुत बढ़िया सर...

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  6. लाजवाब क्षणिकाएं....
    वाह!!!

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  7. हमारे वक्त की आवाज़ है कराहट है यह गीत। जिसमें संगीत भी है राजनीतिक खड़दूम भी ,नुचती छीजती प्रकृति भी कंगाली का आर्तनाद भी चिल्लाहट भी ,राजनीतिक बे -शर्मी की अट्टाहस भी ,सुंदर मनोहर :
    veerusa.blogspot.com
    veerujan.blogspot.com
    veerusahab2017.blogspot.com
    satshriakaljio.blogspot.com
    यह कविता का अर्थ जीवन का मर्म सार समझाती सम्प्रेषण प्रधान कविता कैलाश शर्मा साहब की !

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  8. veerusa.blogspot.com
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    यह कविता का अर्थ जीवन का मर्म सार समझाती सम्प्रेषण प्रधान कविता कैलाश शर्मा साहब की !
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    जियो हर पल को
    एक पल की तरह
    सम्पूर्ण अपने आप में,
    न जुड़ा है कल से
    न जुड़ेगा कल से।
    ***

    काश होता जीवन
    कैक्टस पौधे जैसा,
    अप्रभावित
    धूप पानी स्नेह से,
    खिलता जिसका फूल
    तप्त मरुथल में
    दूर स्वार्थी नज़रों से|
    ***

    दुहराता है इतिहास
    केवल उनके लिए
    जो रखते नज़र इतिहास पर।

    जो चलते हैं साथ
    पकड़ उंगली वर्त्तमान की,
    उनका हर क़दम
    बन जाता स्वयं इतिहास
    अगली पीढी का।
    ***

    धुंधलाती शाम
    सिसकती हवा
    टिमटिमाते कुछ स्वप्न
    कसमसाते शब्द
    सबूत हैं मेरे वज़ूद का।
    ***

    ...©कैलाश शर्मा

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  9. वर्तमान के सच को उजागर करती बेहतरीन क्षणिकाएं

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  10. आपकी लिखी रचना "मित्र मंडली" में लिंक की गई है. https://rakeshkirachanay.blogspot.com/2018/12/mitrmandali100.html पर आप सादर आमंत्रित हैं ....धन्यवाद!

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  11. यथार्थ के धरातल पर पांव जमा कर चलते चलो।
    वाह बहुत खूब।

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  12. बहुत खूब ...
    सच के करीब बैठ कर लिखी सत्य कहती क्षणिकाएं ...
    जिन्दा हैं तो सुबूत होना जरूरी है ....

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  13. सभी क्षणिकाएँ बेहद भावपूर्ण, बधाई.

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  15. सभी क्षणिकाएं एक से बढ़ कर एक हैं। बहुत सुंदर।

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  16. बहुत ही सार्थक क्षणिकाएं आदरणीय सर | पर ये मुझे बहुत खास लगी मुझे |
    काश होता जीवन
    कैक्टस पौधे जैसा,
    अप्रभावित
    धूप पानी स्नेह से,
    खिलता जिसका फूल
    तप्त मरुथल में
    दूर स्वार्थी नज़रों से
    सादर बधाई और शुभकामनायें |

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