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Saturday, December 01, 2018

क्षणिकाएं


नहीं चल पाता सत्य
आज अपने पैरों पर,
वक़्त ने कर दिया मज़बूर
पकड़ कर चलने को
उंगली असत्य की।
***

चलते नहीं साथ साथ
हमारे दो पैर भी
एक बढ़ता आगे 
दूसरा रह जाता पीछे,
क्यूँ हो फ़िर शिकायत
जब न दे कोई साथ
जीवन के सफ़र में।
***

ढूँढते प्यार हर मुमकिन कोने में
पाते हर कोना खाली
और बैठ जाते निराशा से
एक कोने में.

समय करा देता अहसास
छुपी थी खुशियाँ और प्यार
अपने ही अंतर्मन में
अनजान थे जिससे अब तक।
***

समझौता हर क़दम
अपनी खुशियों से,
कुचलना ख्वाहिशों का
जीवन के हर पल में,
क्या अर्थ ऐसे जीवन का।


समझौतों के साथ जीने से 
क्या नहीं बेहतर है
अकेलेपन का सूनापन?
***


...©कैलाश शर्मा

Sunday, August 17, 2014

मत मौन रहो अब मनमोहन

                 **श्री कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनायें**

मत मौन रहो अब मनमोहन, वरना पाषाण कहाओगे।
क्या भूल गये वादा अपना, तुम दुष्ट दलन को आओगे।

है लाज नारियों की लुटती,
तुम मौन खड़े क्यों देख रहे?
क्या सुनते सिर्फ़ द्रौ
पदी की,
क्या औरों से रिश्ते नहीं रहे?

द्वापर में एक दुशासन था, बस्ती बस्ती में अब घूम रहे,
नित दिन है चीर हरण होता, क्या आँख मूँद सो पाओगे।

क्या झूठ कहा तुमने माधव,
जब भी अधर्म होगा जग में।
स्थापना धर्म की हेतु पुनः,   
मैं आऊँगा तब तब जग में।

जब नहीं सुरक्षित बच्ची भी, फ़िर क्या अधर्म अब बाकी है,
क्या है अधर्म का मापदंड, क्या दुनिया को बतलाओगे।

जब सत्य खड़ा चौराहे पर,
सिंहासन पर बैठा असत्य।
जन कैसे यह विश्वास करे,
पाता सदैव ही विजय सत्य।

जन जन है त्रसित पुकार रहा, कैसे है चुप तुम रह सकते,
विश्वास भक्त का भंग हुआ, रणछोर पुनः कहलाओगे।


....कैलाश शर्मा 

Monday, January 13, 2014

मौन

मौन नहीं स्वीकृति हार की
मौन नहीं स्वीकृति गलती की,
मौन नहीं है मेरा डर 
और न ही मेरी कमजोरी,
झूठ से पर्दा मैं भी उठा सकता हूँ
और दिखा सकता हूँ आइना सच का,
लेकिन क्यों उठती उंगली 
सदैव सच पर ही,
होता है खड़ा कटघरे में
और देनी पड़ती अग्नि परीक्षा 
सदैव सच को ही।

जब मुखर होता असत्य
और दब जाती आवाज़
सत्य की 
असत्य के शोर में,
हो जाता मौन 
सत्य कुछ पल को।
सत्य हारा नहीं 
सत्य मरा नहीं 
केवल हुआ है मौन 
समय के इंतज़ार में।


..... © कैलाश शर्मा