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Sunday, September 13, 2015

इश्क़ को ज़ब से बहाने आ गए

इश्क़ को ज़ब से बहाने आ गए,
दर्द भी अब आज़माने आ गए।

दर्द की रफ़्तार कुछ धीमी हुई,
और भी गम आज़माने आ गए।

कौन कहता है अकेला हूँ यहाँ,
याद भी हैं साथ देने आ गए।

रात भर थे साथ में आंसू मिरे,
सामने तेरे छुपाने आ गए।

हाथ में जब हाथ था आने लगा,
बीच में फिर से ज़माने आ गए।

            (अगज़ल/अभिव्यक्ति)


....©कैलाश शर्मा