आज़ ज़ज्बातों को गंगा में बहा आया हूँ,
टूटे ख़्वाबों को मैं खुद ही ज़ला आया हूँ.
अब न पैरों में चुभेंगी यादों की किरचें,
मैं उन्हें उनको ही सौगात में दे आया हूँ.
अब न रिश्ते की ज़रुरत है, न रहबर की,
साथ तनहाई को मैं अब घर ले आया हूँ.
मौन की भाषा समझ पायी है कब दुनियां,
बाद खोने के तुम्हें अब ये समझ पाया हूँ.
अब न अहसास के ज़ंगल में भटकना होगा,
आज मैं दिल को पत्थर से बदल लाया हूँ.
...कैलाश शर्मा
